रायपुर। हिडमालु और संतोष नाम से कम पर माडवी हिडमा पहचान से बेहद कुख्यात रहा नक्सली कमांडर आखिरकार मारा गया। देश की दशकों पुरानी नक्सल समस्या के दौरान दो दर्जन से अधिक बड़े हमलों को अंजाम दे चुका हिडमा देश के सबसे खूंखार नक्सली कमांडरों में शामिल हो गया था। वह दंतेवाड़ा हमले के लिए भी जिम्मेदार था जिसमें एक साथ 76 जवानों की मौत हो गई थी। मंगलवार को आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा पर हिडमा अपनी पत्नी राजे के साथ मारा गया। इसे नक्सलियों के लिए हाल के सालों में सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है।
छत्तीसगढ़ के सुकम जिले का रहने वाले हिडमा करीब 20 सालों तक आतंक का पर्याय बना रहा। एक के बाद एक हमलों को अंजाम देते हुए वह नक्सली संगठन में एक साधारण लड़ाके से काफी ऊंचे ओहदे वाले कमांडर तक बढ़ता चला गया। वह बटालियन नंबर एक का मुखिया था, जिसे सबसे सीपीआई (एम) का सबसे खतरनाक यूनिट माना जाता है। दंडकारण्य क्षेत्र के घने जंगलों में इनका गढ़ था।
अबूझमाड़ और सुकमा-बीजापुर के जंगल को लेकर अपनी जानकारी को लेकर नक्सलियों के बीच उसकी खास पूछ थी। वह सबसे दुर्जेय नक्सली कमांडर था जो अब भी दक्षिण बस्तर में सक्रिय था। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि पिछले दो दशक में वह सभी बड़े नक्सली हमलों में शामिल था। उसका नाम पुलिस रिकॉर्ड में 2010 के दंतेवाड़ा हमले के बाद आया जिसमें 76 सीआरपीएफ जवान मारे गए थे। इसके अलावा 2013 में उसने दर्भा घाटी में एक बड़े हमले को अंजाम दिया जिसमें कांग्रेस के कई बड़े नेताओं की जान चली गई थी। 2017 में भी जब सुकमा हमले में 37 सुरक्षाकर्मियों की जान गई तो हिडमा का नाम चर्चा में आया था।
हिडमा कितना खूंखार था इसका अंदाजा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि वह एनआईए की मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट में शामिल है और उसके सर पर केंद्र और राज्य की एजेंसियों ने एक करोड़ से अधिक का इनाम रखा था। हाल के सालों में नक्सलियों के खिलाफ बेहद तेज हो चुके ऑपरेशन के बावजूद हिडमा खुद को बचाने और सुरक्षाबलों को चकमा देने में कामयाब होता रहा। अप्रैल 2025 में वह बचकर भागने में कामयाब रहा था। कर्रेगुट्टा पहाड़ियों पर कई दिन तक चले मुठभेड़ में 31 नक्सली मारे गए थे।
हिडमा अब दंडकारण्य स्पेशल जोन कमिटी (DKZC) में सचिव बन चुका था जो सीपीआई (माओवादी) की सबसे शक्तिशाली फैसला लेने वाली संस्था है। अधिकारी बताते हैं हिडमा 130-150 लड़ाकों के साथ एक बटालियन को कमांड करता था। वह नक्सल प्रभाव वाले इलाकों में जंगलों में छिपकर और डरा-धमकाकर ग्रामीणों की मदद लेकर अपने मंसूबों को अंजाम देने में जुटा था।

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