राजगढ़ जिले के ब्यावरा क्षेत्र में खाटू श्याम मंदिर के निर्माण को लेकर विवाद गहरा गया है। लखनवास क्षेत्र में बड़ली माता मंदिर की पहाड़ी पर निर्माणाधीन मंदिर को प्रशासन ने जेसीबी की मदद से हटा दिया। कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में पुलिस बल और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर मौजूद रहे।
बताया जा रहा है कि करीब 2 हजार वर्ग फीट क्षेत्र में चल रहे निर्माण को हटाने की कार्रवाई की गई। प्रशासन की कार्रवाई के बाद ग्रामीणों में नाराजगी देखी गई और मौके पर तनाव की स्थिति भी बनी।
15 गांवों के लोगों ने जुटाया था चंदा
ग्रामीणों का कहना है कि यह मंदिर किसी एक व्यक्ति की निजी पहल नहीं था। आसपास के करीब 15 गांवों के लोगों ने मिलकर मंदिर निर्माण के लिए चंदा जुटाया था।
ग्रामीणों के मुताबिक, सामूहिक सहयोग से बड़ली माता की पहाड़ी पर खाटू श्याम मंदिर बनाने का काम शुरू किया गया था। इसलिए उनके लिए यह निर्माण केवल एक भवन नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और सामूहिक भागीदारी का प्रतीक था।
ग्रामीणों ने कार्रवाई को लेकर कई सवाल भी उठाए हैं।
- मंदिर निर्माण में कई गांवों के लोगों की भागीदारी थी।
- ग्रामीणों का दावा है कि निर्माण के लिए सामूहिक रूप से चंदा जुटाया गया।
- उनका आरोप है कि कार्रवाई से पहले पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई।
- ग्रामीणों के अनुसार उन्हें नोटिस और अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
हालांकि, नोटिस दिए जाने के संबंध में प्रशासन का पक्ष ग्रामीणों के दावे से अलग है।
प्रशासन ने बताया सरकारी जमीन पर अतिक्रमण
ब्यावरा के तहसीलदार रामनिवास धाकड़ के मुताबिक, मंदिर का निर्माण जिस जमीन पर किया जा रहा था, वह सरकारी जमीन है। प्रशासन का कहना है कि वहां नियमों के विरुद्ध निर्माण किया जा रहा था, जिसे अतिक्रमण मानते हुए हटाया गया।
तहसीलदार के अनुसार कार्रवाई अचानक नहीं की गई। संबंधित पक्ष को नियमों के तहत नोटिस जारी किए गए थे और इसके बाद वैधानिक प्रक्रिया पूरी करते हुए निर्माण हटाया गया।
प्रशासन का स्पष्ट कहना है कि सरकारी जमीन पर किसी भी प्रकार के अतिक्रमण को अनुमति नहीं दी जा सकती और नियमों के अनुसार कार्रवाई जारी रहेगी।
ग्रामीणों ने लगाए अवैध खनन के आरोप
मंदिर हटाए जाने के बाद ग्रामीणों ने प्रशासन की कार्रवाई पर एक और गंभीर सवाल खड़ा किया। ग्रामीणों का आरोप है कि इलाके में क्रेशर मशीन लगाने और अवैध खनन के लिए रास्ता साफ करने की कोशिश हो सकती है।
ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में पहले से ही अवैध खनन और ब्लास्टिंग को लेकर शिकायतें की जाती रही हैं। उनका दावा है कि इन शिकायतों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई, लेकिन मंदिर का निर्माण शुरू होते ही प्रशासन ने तेजी से कार्रवाई कर दी।
हालांकि, अवैध खनन और क्रेशर मशीन से जुड़े इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी के आधार पर नहीं हुई है। इसलिए इन दावों को फिलहाल ग्रामीणों के आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
कार्रवाई के दौरान भारी पुलिस बल रहा मौजूद
मंदिर निर्माण हटाने के दौरान प्रशासन ने सुरक्षा के लिहाज से बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को मौके पर तैनात किया। बताया जा रहा है कि 100 से अधिक पुलिसकर्मी और प्रशासनिक अमला कार्रवाई के दौरान मौजूद था।
भारी पुलिस बल की मौजूदगी के बीच जेसीबी से निर्माण हटाया गया। कार्रवाई के बाद ग्रामीणों और प्रशासन के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए।
मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि मंदिर निर्माण वाली जमीन की वास्तविक स्थिति क्या थी और निर्माण को लेकर प्रशासन ने कौन-सी कानूनी प्रक्रिया अपनाई।
दोनों पक्षों के दावों में अंतर
इस पूरे विवाद में फिलहाल दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आ रही हैं।
ग्रामीणों का पक्ष:
- मंदिर 15 गांवों की सामूहिक आस्था से जुड़ा था।
- निर्माण के लिए ग्रामीणों ने चंदा जुटाया था।
- कार्रवाई को लेकर ग्रामीणों ने प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
- ग्रामीणों ने क्षेत्र में अवैध खनन और क्रेशर से जुड़े आरोप भी लगाए हैं।
प्रशासन का पक्ष:
- निर्माण सरकारी जमीन पर किया जा रहा था।
- निर्माण को अतिक्रमण माना गया।
- संबंधित पक्ष को नोटिस दिए जाने की बात प्रशासन ने कही है।
- वैधानिक प्रक्रिया के बाद निर्माण हटाने का दावा किया गया है।
अब जांच और दस्तावेजों पर टिकी नजर
बड़ली माता पहाड़ी पर मंदिर निर्माण हटाए जाने के बाद विवाद केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जमीन के स्वामित्व और प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जमीन से जुड़े राजस्व रिकॉर्ड क्या कहते हैं, निर्माण की अनुमति को लेकर कोई दस्तावेज मौजूद थे या नहीं और प्रशासन द्वारा जारी किए गए नोटिस की प्रक्रिया क्या थी।
साथ ही ग्रामीणों द्वारा लगाए गए अवैध खनन और क्रेशर से जुड़े आरोपों की भी यदि जांच होती है, तो स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
फिलहाल खाटू श्याम मंदिर को लेकर ग्रामीणों की नाराजगी और प्रशासन का अतिक्रमण हटाने का दावा आमने-सामने है। मामले का वास्तविक निष्कर्ष दस्तावेजों, आधिकारिक जांच और संबंधित पक्षों के तथ्यों के आधार पर ही सामने आएगा।

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