रायगढ़ में सेठ किरोड़ीमल धर्मादा ट्रस्ट की संपत्तियों को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शहर के बीचोंबीच स्थित बताए जा रहे जूता गोदाम को करीब 25 लाख रुपये में बेचे जाने की चर्चा सामने आने के बाद ट्रस्ट की संपत्तियों की देखरेख और उनके इस्तेमाल को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
बताया जा रहा है कि संबंधित सौदे की प्रक्रिया काफी आगे बढ़ चुकी है और खरीदार की ओर से 25 लाख रुपये के भुगतान का दावा भी किया जा रहा है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी मानी जा रही है।
स्टेशन रोड की संपत्ति के बाद जूता गोदाम का मामला
ट्रस्ट की संपत्तियों को लेकर इससे पहले भी कई तरह के आरोप और चर्चाएं सामने आती रही हैं। स्टेशन रोड स्थित ट्रस्ट की एक संपत्ति को करीब 1 करोड़ 31 लाख रुपये में बेचे जाने की बात कही जा रही है।
अब जूता गोदाम से जुड़ी कथित 25 लाख रुपये की डील ने पूरे मामले को फिर चर्चा में ला दिया है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि धर्मादा ट्रस्ट की संपत्ति वास्तव में बेची जा रही है, तो:
- संपत्ति बेचने का अधिकार किसके पास है?
- बिक्री के लिए कौन-सी कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया अपनाई गई?
- संपत्ति का वास्तविक बाजार मूल्य क्या था?
- बिक्री से प्राप्त रकम ट्रस्ट के खाते में जमा हुई या नहीं?
- सौदे से संबंधित दस्तावेज और हिसाब-किताब सार्वजनिक क्यों नहीं हैं?
इन सवालों के जवाब सामने आना बेहद जरूरी है।
धर्मार्थ ट्रस्ट के मूल उद्देश्य पर भी सवाल
सेठ किरोड़ीमल द्वारा बनाए गए धर्मार्थ ट्रस्ट का उद्देश्य जनसेवा से जुड़ा बताया जाता है। ट्रस्ट के माध्यम से स्कूल, अस्पताल और धर्मशालाओं जैसी संस्थाओं के संचालन और निर्माण की बात सामने आती है।
ऐसे संस्थानों की संपत्तियां यदि मौजूद हैं, तो उनका इस्तेमाल मूल धर्मार्थ उद्देश्य के अनुरूप हो रहा है या नहीं, इसकी निगरानी भी महत्वपूर्ण है।
आरोप यह भी लगाए जाते रहे हैं कि समय के साथ ट्रस्ट की कई संपत्तियों को बेचने या किराये पर देने से जुड़ी गतिविधियां बढ़ीं। हालांकि, इन आरोपों की सच्चाई का निर्धारण केवल दस्तावेजी जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही किया जा सकता है।
ट्रस्ट की संपत्तियों की जांच की मांग तेज
रायगढ़ में अब मांग उठ रही है कि ट्रस्ट की सभी प्रमुख संपत्तियों का रिकॉर्ड खंगाला जाए। खासकर उन संपत्तियों की जांच जरूरी है, जिनके संबंध में बिक्री, हस्तांतरण या किराये पर दिए जाने के आरोप सामने आए हैं।
जांच में मुख्य रूप से इन बिंदुओं को शामिल किया जा सकता है:
- ट्रस्ट के नाम दर्ज कुल संपत्तियों की सूची।
- पिछले वर्षों में बेची गई संपत्तियों का रिकॉर्ड।
- संपत्तियों के बिक्री मूल्य और बाजार मूल्य की तुलना।
- किराये पर दी गई संपत्तियों से प्राप्त आय।
- ट्रस्ट के बैंक खातों और आय-व्यय का विवरण।
- नियमित ऑडिट और वित्तीय रिपोर्ट की स्थिति।
- संपत्ति हस्तांतरण के लिए अपनाई गई कानूनी प्रक्रिया।
कलेक्टर की जांच से बढ़ी उम्मीद
कोकड़ीतराई की ट्रस्ट संपत्तियों से जुड़े मामलों के सामने आने के बाद कलेक्टर द्वारा जांच समिति गठित किए जाने की बात कही जा रही है। इसी वजह से अब रायगढ़ की ट्रस्ट संपत्तियों की भी विस्तृत जांच की उम्मीद बढ़ गई है।
यदि प्रशासन पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराता है, तो ट्रस्ट की संपत्तियों से जुड़े पुराने रिकॉर्ड और लेन-देन की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
साथ ही यह भी सामने आ सकता है कि कौन-सी संपत्ति किस प्रक्रिया के तहत बेची या किराये पर दी गई और उससे प्राप्त रकम का इस्तेमाल कहां किया गया।
प्रशासन की चुप्पी पर उठ रहे सवाल
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल प्रशासन की भूमिका को लेकर है। यदि ट्रस्ट की संपत्तियों की बिक्री से जुड़े आरोप लगातार सामने आ रहे हैं, तो संबंधित दस्तावेजों की जांच कर स्थिति स्पष्ट करना प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है।
हालांकि, किसी भी व्यक्ति या पदाधिकारी पर भ्रष्टाचार अथवा अवैध बिक्री का आरोप तब तक तथ्य के रूप में नहीं माना जा सकता, जब तक सक्षम जांच एजेंसी या न्यायिक प्रक्रिया से इसकी पुष्टि न हो जाए।
फिलहाल 25 लाख रुपये के कथित जूता गोदाम सौदे ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—**आखिर धर्मार्थ ट्रस्ट की संपत्तियों का वास्तविक रिकॉर्ड क्या है और इन संपत्तियों से होने

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