नई दिल्ली। देशभर में दक्षिण-पश्चिम मानसून की धीमी रफ्तार ने किसानों, जल प्रबंधन एजेंसियों और मौसम विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। जून 2026 के मध्य तक पहुंचते-पहुंचते मानसून सामान्य से काफी पीछे चल रहा है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार 4 जून से 18 जून के बीच देश में सामान्य से 42 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है।
इस अवधि में जहां सामान्य रूप से 72.2 मिमी वर्षा होनी चाहिए थी, वहीं केवल 42.1 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गई। मानसून सीजन की शुरुआत के कुछ ही सप्ताह बाद सामने आए ये आंकड़े देश के कई हिस्सों में संभावित जल संकट और कृषि चुनौतियों की ओर संकेत कर रहे हैं।
देश के बड़े हिस्से में बारिश की भारी कमी
ताजा वर्षा आंकड़ों के अनुसार मध्य भारत, पूर्वी भारत और प्रायद्वीपीय क्षेत्रों के बड़े हिस्से में सामान्य से काफी कम बारिश हुई है।
प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति
- कई जिलों में 20% से 59% तक बारिश की कमी।
- कुछ इलाकों में 60% से 90% तक वर्षा घाटा।
- महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, विदर्भ और गुजरात के कई हिस्से प्रभावित।
- पूर्वी भारत के कई क्षेत्रों में भी मानसून कमजोर।
इसके विपरीत उत्तर-पश्चिम भारत और पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक वर्षा दर्ज की गई है।
मानसून की रफ्तार क्यों थम गई?
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार मानसून की प्रगति फिलहाल कई वायुमंडलीय कारणों से प्रभावित हो रही है।
मुख्य कारण:
- सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance)
- ऊपरी वायुमंडल में प्रतिकूल परिस्थितियां
- अरब सागर शाखा की कमजोरी
- नमी वाली हवाओं का मध्य भारत तक नहीं पहुंच पाना
- बंगाल की खाड़ी शाखा का सीमित प्रभाव
इन कारणों से मानसून की सामान्य उत्तरवर्ती प्रगति बाधित हो रही है।
सैटेलाइट तस्वीरों ने बढ़ाई चिंता
18 जून को प्राप्त सैटेलाइट तस्वीरों में पश्चिमी हिमालय और उत्तरी क्षेत्रों में बादलों की सक्रियता दिखाई दी, जबकि देश के अधिकांश मानसूनी क्षेत्रों में बादलों का घनत्व अपेक्षाकृत कम रहा।
विशेष रूप से—
- मध्य भारत में बादल कम सक्रिय
- महाराष्ट्र और गुजरात में सीमित वर्षा प्रणाली
- पश्चिमी तट पर गहरे संवहन की कमी
- बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में आंशिक गतिविधियां
इन संकेतों से निकट भविष्य में व्यापक वर्षा की संभावना फिलहाल कमजोर दिखाई दे रही है।
मुंबई में दशक का सबसे सूखा जून
बारिश की कमी का प्रभाव अब बड़े शहरों में भी दिखने लगा है।
मुंबई में जून का महीना पिछले एक दशक के सबसे सूखे जून महीनों में शामिल हो गया है। जलाशयों में पानी के स्तर को देखते हुए स्थानीय प्रशासन को जल उपयोग को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ रही है।
वहीं महाराष्ट्र, विदर्भ और मध्य प्रदेश के कई किसान मानसून के मजबूत होने का इंतजार कर रहे हैं ताकि खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित न हो।
किसानों के लिए बढ़ी चिंता
मानसून में देरी का सबसे बड़ा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है।
संभावित प्रभाव
- खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है।
- सिंचाई पर निर्भरता बढ़ेगी।
- जलाशयों में जल संग्रहण कम हो सकता है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट गहरा सकता है।
- कृषि लागत बढ़ने की आशंका।
विशेषज्ञों का मानना है कि जून के अंतिम सप्ताह में अच्छी बारिश नहीं हुई तो कई राज्यों में कृषि गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।
जुलाई में भी राहत की उम्मीद कमजोर
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून की स्थिति सामान्य करने के लिए अगले कुछ दिनों में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों क्षेत्रों से मजबूत मौसम प्रणालियों का विकसित होना जरूरी है।
हालांकि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए तत्काल बड़े सुधार के संकेत नहीं मिल रहे हैं। यदि अगले सप्ताह तक कोई मजबूत कम दबाव का क्षेत्र विकसित नहीं होता, तो जून के अंत तक वर्षा घाटा बना रह सकता है।
आगे क्या?
देश की निगाहें अब जुलाई के पहले पखवाड़े पर टिकी हैं। यदि मानसून जल्द सक्रिय नहीं हुआ, तो कृषि, जल प्रबंधन और बिजली उत्पादन जैसे कई क्षेत्रों पर इसका असर दिखाई दे सकता है।
फिलहाल मौसम विभाग लगातार स्थिति की निगरानी कर रहा है और आने वाले दिनों में बनने वाली मौसम प्रणालियों पर विशेष नजर रखी जा रही है। मानसून की अगली चाल ही तय करेगी कि देश इस बारिश की कमी से कितनी जल्दी उबर पाता है।

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