April 28, 2026

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सरसों की फसल काफी बेहतर होने की उम्मीद के बीच सस्ता हुआ तेल

देश में सस्ते आयातित तेलों की भरमार है और सरसों की आगामी फसल काफी बेहतर होने की उम्मीद के बीच दिल्ली तेल-तिलहन बाजार में मंगलवार को सरसों, मूंगफली, सोयाबीन, बिनौला, कच्चा पामतेल (सीपीओ) और पामोलीन सहित लगभग सभी तेल-तिलहनों की कीमतों में गिरावट रही।

बाजार सूत्रों ने कहा कि  सोयाबीन के साथ साथ सरसों के खपने की मुश्किलों को देखते हुए कम से कम सूरजमुखी जैसे हल्के तेलों पर आयात शुल्क अधिकतम सीमा तक बढ़ाकर लगाया जाना चाहि,। ऐसी स्थिति में ही हमारे देशी सोयाबीन और सरसों की खपत हो पाएगी। देश में लगभग 125 लाख टन का सरसों तिलहन का स्टॉक हो जाएगा। 

 दिल्ली मंडी में तेल-तिलहनों के भाव इस प्रकार रहे

  •      सरसों तिलहन – 6,630-6,680 (42 प्रतिशत कंडीशन का भाव) रुपये प्रति क्विंटल।
  •      मूंगफली – 6,615-6,675 रुपये प्रति क्विंटल।
  •      मूंगफली तेल मिल डिलिवरी (गुजरात) – 15,650 रुपये प्रति क्विंटल।
  •      मूंगफली रिफाइंड तेल 2,470-2,735 रुपये प्रति टिन।
  •      सरसों तेल दादरी- 13,150 रुपये प्रति क्विंटल।
  •      सरसों पक्की घानी- 2,000-2,130 रुपये प्रति टिन।
  •      सरसों कच्ची घानी- 2,060-2,185 रुपये प्रति टिन।
  •      तिल तेल मिल डिलिवरी – 18,900-21,000 रुपये प्रति क्विंटल।
  •      सोयाबीन तेल मिल डिलिवरी दिल्ली- 13,050 रुपये प्रति क्विंटल।
  •      सोयाबीन मिल डिलिवरी इंदौर- 12,900 रुपये प्रति क्विंटल।
  •      सोयाबीन तेल डीगम, कांडला- 11,450 रुपये प्रति क्विंटल।
  •      सीपीओ एक्स-कांडला- 8,340 रुपये प्रति क्विंटल।
  •      बिनौला मिल डिलिवरी (हरियाणा)- 11,650 रुपये प्रति क्विंटल।
  •      पामोलिन आरबीडी, दिल्ली- 9,980 रुपये प्रति क्विंटल।
  •      पामोलिन एक्स- कांडला- 8,980 रुपये (बिना जीएसटी के) प्रति क्विंटल।
  •      सोयाबीन दाना – 5,530-5,630 रुपये प्रति क्विंटल।
  •      सोयाबीन लूज- 5,275-5,295 रुपये प्रति क्विंटल।
  •      मक्का खल (सरिस्का)- 4,010 रुपये प्रति क्विंटल।

कच्चा पामतेल की खपत गरीब उपभोक्ताओं में होती है, इसलिए उसके आयात शुल्क में मामूली वृद्धि भी की जाएतो गरीबों को तेल सस्ता ही मिलने का अनुमान है, लेकिन नरम तेलों (सॉफ्ट आयल) पर अधिकतम सीमा तक आयात शुल्क लगाना फौरी जरूरत है। सस्ते आयातित तेलों की वजह से तेल के थोक दाम टूटे हुए हैं। ऐसे में देश के तिलहन उत्पादक किसानों के फसल कैसे खपेंगे इस पर गंभीरता से विचार करने की जरुरत है।