बारसूर का बत्तीसा मंदिर: शिल्पकला और इतिहास का अद्भुत संगम
रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में स्थित बारसूर का बत्तीसा मंदिर भारतीय स्थापत्य कला, आध्यात्मिक आस्था और प्राचीन इतिहास का अद्वितीय संगम है। यह मंदिर न केवल धार्मिक स्थल है, बल्कि 11वीं शताब्दी की शिल्प परंपरा और इंजीनियरिंग कौशल का जीवंत उदाहरण भी है।
32 स्तंभों पर टिकी अद्भुत संरचना
बत्तीसा मंदिर का निर्माण नागवंशी शासक सोमेश्वर देव के काल में हुआ माना जाता है।
इसका नाम “बत्तीसा” इसलिए पड़ा क्योंकि यह 32 विशाल पत्थर के स्तंभों पर आधारित है।
ये स्तंभ आठ पंक्तियों में अत्यंत संतुलित ढंग से स्थापित हैं, जो उस समय के वास्तु ज्ञान और इंजीनियरिंग कौशल को दर्शाते हैं।
बिना चूना-गारा के निर्माण
मंदिर का निर्माण पत्थरों को बिना चूना-गारा जोड़कर किया गया है।
प्रत्येक स्तंभ पर देवी-देवताओं, पौराणिक कथाओं और अलंकरणों की बारीक नक्काशी की गई है।
मंदिर की संरचना चतुर्भुजाकार है और इसमें दो गर्भगृह हैं, जिनमें अलग-अलग शिवलिंग स्थापित हैं।
यांत्रिक चमत्कार: घूमता शिवलिंग
गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग विशेष यांत्रिक प्रणाली पर आधारित है।
बताया जाता है कि जल प्रवाह के प्रभाव से यह शिवलिंग बिना घर्षण और बिना ध्वनि के घूम सकता है।
नंदी बैल की प्रतिमा और पौराणिक मान्यताएं इस मंदिर की आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि को और भी रोचक बनाती हैं।
ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व
शिलालेखों से पता चलता है कि मंदिर का निर्माण शासक, मंत्री और गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में हुआ।
कहा जाता है कि यह क्षेत्र कभी बाणासुर की राजधानी था।
वर्तमान में शिलालेख नागपुर संग्रहालय में सुरक्षित है।
पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत
बत्तीसा मंदिर मामा-भांजा मंदिर और चंद्रादित्य मंदिर के साथ मिलकर बस्तर की समृद्ध विरासत को दर्शाता है।
यहां विश्व की तीसरी सबसे बड़ी गणेश प्रतिमा भी स्थित है, जो पर्यटकों और श्रद्धालुओं का आकर्षण का केंद्र है।
राज्य सरकार और पुरातत्व विभाग द्वारा निरंतर संरक्षण कार्य किया जा रहा है।

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