राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में सरकार ने स्कूल छोडऩे वाले बच्चों के जो आंकड़े बताए हैं. वे हैरान-परेशान करते हैं. 2020-21 से 2025-26 के बीच 65 लाख 70 हजार बच्चे स्कूल छोड़ चुके हैं और इनमें 29.8 लाख कम उम्र छात्राएं शामिल हैं. यह हाल तब है जब केन्द्र सरकार का एक बड़ा बजट राज्यों को मिलता है. स्कूली शिक्षा के लिए, और राज्यों का अपना पैसा भी इस पर खर्च होता है.
लेकिन इन आंकड़ों से परे जो बात ज्यादा हैरान करती है वह गुजरात में स्कूल छोडऩे वाले बच्चों की तादाद में 340 फीसदी! चूंकि ये आंकड़े मोदी सरकार के दिए हुए हैं, और संसद में पेश हैं. इसलिए हम यह नहीं मान सकते कि गुजरात की ऐसी दुर्गति बताने वाले ये आंकड़े गलत होंगे. अब गुजरात के बारे में यह ध्यान रखना होगा कि यह न सिर्फ एक बहुत ही विकसित और कारोबार-संपन्न राज्य है, बल्कि पिछले 30 साल 2 महीने से यहां पर लगातार भाजपा सरकार रही है. 1995 से अब तक अंगद के इस पांव को कोई हिला नहीं पाए हैं। इसमें से कई बरस, 12 साल 7 महीने एक पखवाड़ा तो नरेन्द्र मोदी की सरकार भी रही है. अब पिछले 11 बरस से नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, इसलिए भी गुजरात के साथ किसी भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं है. पिछले बरस आंकड़े सही दर्ज नहीं हुए थे और इस बरस सही दर्ज हुए हैं तो इन दोनों बरसों में भी वहां भाजपा की ही सरकार रही है.
मोदी के प्रधानमंत्री रहते और गुजरात में भाजपा की सरकार रहते यह उम्मीद की जाती है कि गुजरात अधिकतर पैमानों पर देश की एक सबसे अच्छी मिसाल रहे. फिर भी अगर वहां पिछले बरस के मुकाबले इस बरस स्कूल छोडऩे वाले बच्चों की तादाद में 340 फीसदी बढ़ोत्तरी हुई है. तो यह बहुत फिक्र की बात है. इसके फौरन बाद जो दो राज्य आते हैं, वे असम और राजस्थान भी भाजपा शासन के ही हैं. केन्द्र सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी दोनों को अपने इन प्रदेशों पर खास गौर करना चाहिए.
पहली से आठवीं तक इस राज्य में स्कूल छोडऩे वाले बच्चे साल भर में 10 फीसदी बढ़े हैं. और नवमीं से बारहवीं के बीच 18 फीसदी.. देश में स्कूल छोडऩे वाले बच्चों के राष्ट्रीय औसत से छत्तीसगढ़ के आंकड़े ज्यादा हैं. छत्तीसगढ़ मेें नक्सल प्रभावित सुकमा में सबसे ज्यादा लड़कियों ने स्कूल छोड़ा है. और बहुत से मामलों में जल्दी शादी हो जाना, लड़कियों को घरेलू काम में लगा देना, और मां-बाप का मजदूरी के लिए दूसरे प्रदेश जाना भी एक वजह है.
राज्यों को अपना कामकाज सुधारने के लिए इन आंकड़ों को गंभीरता से लेना चाहिए. केन्द्र सरकार के अधिकतर सर्वे में सामाजिक पैमानों पर, आर्थिक और लैंगिक पैमानों पर केरल लगातार सबसे ऊपर बने रहता है. हालांकि देश के सबसे पिछले हुए राज्य भी राजनीतिक आधार पर केरल को अपने से सीखने की चुनौती देते रहते हैं. और केन्द्र सरकार के आंकड़े उन्हें उनकी जगह बताते रहते हैं. हम इन पैमानों की बात करते हुए राजनीतिक बात करना नहीं चाहते. लेकिन देश के निर्विवाद आंकड़ों में कोई राज्य लगातार सबसे अच्छा बना हुआ है, तो बाकी राज्यों को उससे सीखते हुए कोई राजनीतिक शर्म नहीं आनी चाहिए. राजनीतिक मुकाबला एक अलग बात रहती है, अपनी जनता की हालत को बेहतर बनाना किसी भी सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के लिए बुनियादी प्राथमिकता रहनी चाहिए.
जीतू पटवारी ने आरोप लगाया कि पिछले 7 सालों में मध्य प्रदेश के सरकारी और निजी स्कूलों में बच्चों का नामांकन 56 लाख घटकर 1 करोड़ 4 लाख रह गया है. जबकि इन सालों में मध्य प्रदेश स्कूल शिक्षा का बजट 7 हजार करोड़ से बढ़कर 37 हजार करोड़ पहुंच गया है. इसके बावजूद बच्चों को मिड डे मील में पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा है.
उन्होंने आरोप लगाया कि यह तथ्य केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने सरकार के सामने रखा है कि प्रदेश के 50 लाख बच्चों ने सेब नहीं खाया. जीतू पटवारी ने आरोप लगाया कि प्रदेश में 56 लाख बच्चे घट गए, लेकिन मिड डे मील पर पैसा खर्च होता रहा. मिड डे मील के नाम पर हर साल 20 हजार करोड़ का घोटाला हुआ है. कांग्रेस ने पूरे मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की है.
जीतू पटवारी ने कहा “केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने कहा कि मध्य प्रदेश के 50 लाख बच्चों ने सेब नहीं देखा, अंजीर नहीं खाया. आज से करीबन 7 से 8 साल पहले की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में 1 से 12वीं क्लास तक निजी और सरकारी स्कूलों में 1 करोड़ 60 लाख बच्चों का पंजीयन हुआ था. तब प्रदेश सरकार के स्कूल शिक्षा का बजट करीबन 9 हजार करोड़ का बजट था. अब 37 हजार करोड़ का स्कूल शिक्षा का बजट है, लेकिन आज स्कूलों में बच्चों की संख्या घटकर 1 करोड़ 4 लाख रह गई है. लगभग 60 लाख बच्चे कम हो गए हैं, लेकिन बजट कई गुना बढ़ गया है.”
अब मिड डे मील की योजना बच्चों के कुपोषण से जुड़ा जो सवाल केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान और राहुल गांधी ने उठाया उसमें 12 रुपए बच्चों को मिलते हैं. उधर गाय के खाने के लिए 40 रुपए रोज खर्च होता है. लेकिन भ्रष्टाचार से गाय, गौशालाओं में दम तोड़ती हैं और इधर बच्चों की वस्तु स्थिति शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र ने आइने के समान प्रदेश को दिखा दी है.
जब हम यह बात उठाते हैं तो कहा जाता है कि कांग्रेस यह राजनीतिक दुर्भावना के चलते मुद्दा उठाती है, लेकिन धर्मेन्द्र प्रधान ने तो राजनीतिक दुर्भावना से यह बात नहीं उठाई. उन्होंने तो प्रदेश की वस्तुस्थिति बताई है.
जीतू पटवारी ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री को चीतों के बच्चे छोड़ने का समय है, लेकिन मध्य प्रदेश के बच्चे कुपोषण में नंबर एक हैं. उनकी समीक्षा करने का समय मुख्यमंत्री के पास नहीं है. प्रदेश के सभी मंत्री मोहन भोग खाने में लगे हैं. सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर 1 करोड़ 60 लाख से घटकर बच्चे 1 करोड़ 6 लाख कैसे संख्या रह गई है. एक तरफ प्रदेश की जनसंख्या 9 करोड़ के आसपास पहुंच गई, लेकिन स्कूलों में बच्चों की संख्या घटकर 1 करोड़ के पास आ गई है. आखिर यह कैसा मैकेनिज्म है.
जीतू पटवारी ने कहा, “इन 50 लाख बच्चों का राशन आखिर कहां गया? क्या बच्चे भी प्रदेश से पलायन कर गए या फिर कागजों पर स्कूलों में बच्चों का एडमिशन दिखाया गया और उनके नाम पर सालों से राशन खाया जा रहा था ? कांग्रेस ने आरोप लगाया कि करीबन हर साल 20 हजार करोड़ का घोटाला हुआ है. कांग्रेस इस पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग करती है.”
अगर 7 हजार करोड़ में 1.60 करोड़ बच्चों की व्यवस्था हो रही थी, तो 1 करोड़ 6 लाख बच्चों के लिए 37000 करोड़ क्यों खर्च किए जा रहे हैं. इसके बाद भी जमीनी स्थिति नहीं सुधरी. विधानसभा में सरकार द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक प्रदेश में 1400 स्कूल एक टीचर के भरोसे चल रहे हैं. गणित और विज्ञान के टीचर ही इन स्कूलों में नहीं हैं. 10 हजार स्कूल बिना प्रिंसिपल के चल रहे हैं. स्कूलों की मरम्मत पर शिक्षा विभाग ने 300 करोड़ रुपए खर्च कर डाले.

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