बिहार में जातीय जनगणना कराने के नीतीश कुमार सरकार के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की गई है। इस याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकार की ओर से जनगणना नहीं कराई जा सकती, यह केंद्र सरकार के ही अधिकार क्षेत्र में आता है। इसके अलावा याचिका में जातीय जनगणना किए जाने को भी गलत बताया गया है और रोक की मांग की गई है। अदालत ने इस अर्जी पर सुनवाई के लिए 20 जनवरी की तारीख तय की है। याचिका में मांग की गई है कि बिहार सरकार की ओर से 6 जनवरी को जातीय जनगणना के लिए जारी नोटिफिकेशन को रद्द किया जाए।
यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता अखिलेश कुमार ने वकील वरुण कुमार सिन्हा और अभिषेक के जरिए दायर की गई है। याची ने कहा कि बिहार सरकार का नोटिफिकेशन अवैध, असंवैधानिक, मनमाना और उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। याची ने कहा कि बिहार में 200 से अधिक जातियां हैं, जिन्हें सामान्य, ओबीसी, ईबीसी, अनुसूचित जाति एवं जनजाति में वर्गीकृत किया गया है। उन्होंने कहा कि राज्य में 113 जातियां अन्य पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़ा वर्ग के दायरे में आती हैं। इसके अलावा 8 जातियों को सामान्य कैटिगरी में रखा गया है।
जातीय जनगणना का मसला बिहार की राजनीति में बेहद संवेदनशील है। नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव समेत कई दलों के नेताओं की ओर से केंद्र सरकार से मांग की गई थी कि वह जातीय जनगणना कराए। लेकिन केंद्र की ओर से इस पर फैसला न लिए जाने के बाद नीतीश कुमार ने राज्य सरकार के स्तर पर यह कराने का ऐलान किया था। यदि सुप्रीम कोर्ट की ओर से इसके खिलाफ कोई फैसला आता है तो विपक्ष की ओर से इसे लेकर केंद्र सरकार पर हमला बोला जा सकता है। माना जा रहा है कि पिछड़े वर्ग के वोटों को देखते हुए कुछ दल जातीय जनगणना को लेकर उत्साहित हैं और उन्हें लगता है कि इसके जरिए उन्हें इन वर्गों के बीच पैठ मजबूत करने का मौका मिलेगा।

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