नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने एक बार फिर पूरी दुनिया के कच्चे तेल बाजार की चिंता बढ़ा दी है। दोनों देशों के बीच ताजा टकराव के बाद Brent Crude की कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। इससे बाजार में यह आशंका मजबूत हुई है कि अगर संघर्ष लंबा चला और तेल की सप्लाई प्रभावित हुई, तो कच्चे तेल की कीमत फिर से 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर सकती है।
तेल की कीमतों में अचानक आई तेजी भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए खास चिंता का विषय है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होने का सीधा असर देश के आयात बिल, रुपये की स्थिति, महंगाई और परिवहन लागत पर पड़ सकता है।
2 सितंबर को कहां पहुंचा कच्चा तेल?
2 सितंबर को ब्रेंट क्रूड करीब 95.4 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। वहीं अमेरिकी WTI क्रूड भी करीब 90.66 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखाई दिया।
ब्रेंट क्रूड लगभग छह सप्ताह के ऊंचे स्तर पर पहुंच चुका है। पिछले कुछ कारोबारी सत्रों में तेल की कीमतों में तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ती चिंता मानी जा रही है।
यही समुद्री मार्ग वैश्विक तेल कारोबार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। दुनिया के समुद्री रास्ते से होने वाले तेल व्यापार का करीब पांचवां हिस्सा इस क्षेत्र से होकर गुजरता है।
ऐसे में अगर यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है या सुरक्षा संबंधी जोखिम बढ़ता है, तो दुनिया के कई देशों तक कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है।
अमेरिका-ईरान तनाव से क्यों बढ़ा तेल का खतरा?
अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव बढ़ने के बाद निवेशकों की चिंता सीधे तेल बाजार में दिखाई दे रही है।
बाजार की सबसे बड़ी चिंता यह है कि संघर्ष केवल दोनों देशों के बीच हमलों तक सीमित रहता है या फिर इसका असर खाड़ी क्षेत्र की ऊर्जा सप्लाई और समुद्री परिवहन पर भी पड़ता है।
तेल बाजार में ऐसी परिस्थितियों में Risk Premium बढ़ जाता है। यानी भविष्य में सप्लाई बाधित होने की आशंका के कारण खरीदार अभी से ज्यादा कीमत चुकाने को तैयार हो जाते हैं।
अगर होर्मुज के रास्ते टैंकरों की आवाजाही में बड़ी बाधा आती है, तो इसका असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। एशिया और यूरोप के कई बड़े तेल आयातक देशों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
भारत के लिए क्यों बढ़ सकती है परेशानी?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमत बढ़ने का असर देश के Import Bill पर पड़ता है।
अगर Brent Crude लंबे समय तक 95 से 100 डॉलर या उससे ऊपर बना रहता है, तो भारत को कच्चा तेल खरीदने के लिए ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ सकती है।
इसका असर कई स्तरों पर देखने को मिल सकता है:
- देश का कच्चे तेल का आयात बिल बढ़ सकता है।
- डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव आ सकता है।
- पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
- ट्रांसपोर्ट और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है।
- महंगे ईंधन से कई वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है।
- महंगाई को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।
हालांकि, पेट्रोल-डीजल की घरेलू कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय क्रूड का असर तुरंत और पूरी तरह एक जैसा नहीं पड़ता। इसमें टैक्स, रुपये-डॉलर विनिमय दर, रिफाइनिंग लागत और घरेलू मूल्य निर्धारण जैसे कई दूसरे कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
महंगा क्रूड बढ़ा सकता है महंगाई का दबाव
कच्चा तेल केवल वाहनों के ईंधन तक सीमित नहीं है। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत बढ़ने का असर अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों पर पड़ता है।
ट्रक, बस और दूसरे परिवहन साधनों की लागत बढ़ने पर माल ढुलाई महंगी हो सकती है। इससे कंपनियों की उत्पादन और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ सकती है।
आखिरकार इसका असर कई वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर पड़ने की संभावना रहती है। यही वजह है कि लंबे समय तक महंगा कच्चा तेल महंगाई के लिए बड़ा जोखिम बन सकता है।
क्या Brent Crude 100 डॉलर के पार जाएगा?
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है। केवल अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने से यह तय नहीं होता कि क्रूड 100 डॉलर पार करेगा। इसके लिए यह देखना जरूरी होगा कि वास्तविक तेल सप्लाई कितनी प्रभावित होती है।
अगर तनाव जल्द कम होता है और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही सामान्य बनी रहती है, तो कीमतों पर बना जोखिम प्रीमियम कम हो सकता है।
लेकिन अगर संघर्ष लंबा खिंचता है और खाड़ी क्षेत्र से तेल की सप्लाई या समुद्री परिवहन प्रभावित होता है, तो Brent Crude के 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने का खतरा काफी बढ़ सकता है।
भारत समेत पूरी दुनिया की नजर होर्मुज पर
अमेरिका-ईरान तनाव के बीच अब निवेशकों की नजर केवल सैन्य गतिविधियों पर नहीं, बल्कि तेल टैंकरों की आवाजाही और होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति पर भी है।
आने वाले दिनों में अगर तनाव कम होता है तो कच्चे तेल की कीमतों में राहत मिल सकती है। लेकिन तनाव बढ़ने के साथ सप्लाई का जोखिम भी बढ़ा तो तेल बाजार में एक बार फिर बड़ी तेजी देखने को मिल सकती है।
यानी फिलहाल 100 डॉलर का आंकड़ा सिर्फ एक संभावित स्तर है, लेकिन अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज की स्थिति इसे तेल बाजार के लिए सबसे अहम जोखिम बना रही है। भारत के लिए इसका मतलब है—महंगा क्रूड, बढ़ता आयात बिल और महंगाई पर अतिरिक्त दबाव।

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