उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलिंडर खरीदने वाली महिलाओं रिफलिंग कराना बंद..
धमतरी/दि बीबीसी लाइव/अरविंद साहू :
रसोई गैस सिलिंडर के बढ़ते दाम को लेकर अब कई परिवारों ने तो रिफलिंग कराना ही बंद कर दिया है। गैस सिलेंडर के दाम हर दूसरे व तीसरे माह में बढ़ने लगा है। मई माह में गैस सिलिंडर 1029 रुपये, जून में फिर बढ़कर 1082 रुपये हुआ। अगस्त माह में 1132 रुपये हो गया और सितंबर माह में गैस सिलिंडर का दाम बढ़कर 1140 रुपये हो गया। जबकि यह दाम ग्रामीण अंचलों में परिवहन शुल्क के साथ 10 रुपये बढ़ जाता है।
इसी तरह प्रति गैस सिलिंडर 1150 रुपये हो गया है। गैस सिलिंडर के बढ़ते दाम को देखते हुए ग्रामीण अंचल में कई परिवार की गृहणियां गैस सिलिंडर की रिफलिंग नहीं कराकर खाना पकाने चूल्हा का उपयोग कर रही है। लकड़ी से चूल्हा जलाकर खाना पकाना उन्हें सस्ता पड़ रहा है। ग्राम पंचायत खरतुली, लोहरसी, पोटियाडीह, परसतराई, मुजगहन, रूद्री, देमार, खपरी समेत कई गांवों की महिलाएं अब गैस सिलिंडर की बजाय लकड़ी जलाकर चूल्हा से खाना पका रही है।
घरेलू रसोई गैस सिलिंडर के दाम स्थिर नहीं है। हर दो-तीन माह में 10 से 15 रुपये की बढ़ोत्तरी हो रही है, ऐसे में गृहणियों का बजट बिगड़ रहा है। ग्रामीण अंचल में तो कई महिलाएं खाना पकाने के लिए अब गैस सिलिंडर की बजाय लकड़ी जलाकर चूल्हा फूंक रही है, ताकि महंगाई से बच सके। वर्तमान में प्रति गैस सिलिंडर 1140 रुपये बिक रहा है, जबकि ग्रामीण अंचल में परिवहन शुल्क के साथ 1150 रुपये हो जाता है। गैस सिलिंडर के बढ़ते दाम को लेकर गृहणियों में आक्रोश है।
चूल्हा से खाना पकाना पड़ रहा सस्ता
गृहणी दीपिका साहू, सुनीति बाई, सावित्री बाई, सोहद्रा बाई आदि ने बताया कि महंगाई में अब गैस सिलिंडर से खाना पकाना महंगा पड़ रहा है।
पांच से छह सदस्यीय परिवार के लिए खाना बनाने सिलिंडर बमुश्किल एक माह चलता है, ऐसे में इसके लिए 1150 रुपये खर्च करना भारी पड़ रहा है। जबकि गांवों में प्रति क्विंटल लकड़ी 700 रुपये तक मिल जाता है, जो माहभर के लिए पर्याप्त रहता है।
खाना बनने चूल्हे के लिए कंडा भी उपयोगी
जहां एक ओर गृहणियों को चूल्हा से खाना बनाना सस्ता पड़ रहा है। उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलिंडर खरीदने वाली महिलाओं ने तो रिफलिंग कराना ही बंद कर दिया है। उल्लेखनीय है कि गांवों में ज्यादातर लोग किसान परिवार से है, ऐसे में खेतों के पेड़ों की लकड़िया और घर में निर्मित कंडा से उन्हें काफी राहत मिल रही है।

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