August 14, 2026

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भारत पर अमेरिका का बड़ा आरोप: चीन के ‘शैडो ट्रेड नेटवर्क’ में शामिल होने का दावा, टैरिफ विवाद से बढ़ी चिंता

अमेरिका और भारत के बीच टैरिफ को लेकर चल रहा विवाद अब एक और गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति के व्यापार एवं विनिर्माण सलाहकार पीटर नवारो ने भारत समेत 40 से अधिक देशों पर चीन के उत्पादों को अमेरिकी बाजार तक पहुंचाने में मदद करने का आरोप लगाया है।

अमेरिका की ओर से जारी रिपोर्ट में इस कथित व्यवस्था को ‘द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम’ बताया गया है। रिपोर्ट का दावा है कि चीन अपने सामान पर लगे अमेरिकी भारी टैरिफ से बचने के लिए तीसरे देशों के रास्ते अमेरिकी बाजार में उत्पाद भेज रहा है।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये अमेरिकी प्रशासन की ओर से लगाए गए आरोप और रिपोर्ट में किए गए दावे हैं। इन्हें भारत द्वारा आरोपों की पुष्टि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

भारत समेत 40 से ज्यादा देशों पर आरोप

पीटर नवारो के मुताबिक चीन के कथित ‘शैडो ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क’ में कई बड़े व्यापारिक साझेदार शामिल हैं। इनमें भारत के अलावा मैक्सिको, कनाडा, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय संघ जैसे देश शामिल बताए गए हैं।

अमेरिकी दावे के अनुसार चीन तीसरे देशों का इस्तेमाल अपने उत्पादों को अमेरिकी टैरिफ से बचाने के लिए कर रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस प्रक्रिया में सामान की:

  • मामूली प्रोसेसिंग की जाती है।
  • लेबल बदले जाते हैं।
  • पैकेजिंग में बदलाव किया जाता है।
  • इनवॉइसिंग में परिवर्तन किया जाता है।
  • सप्लाई रूट को बदला जाता है।
  • इसके बाद उत्पाद को तीसरे देश से अमेरिका भेजा जाता है।

अमेरिका का आरोप है कि इन बदलावों के बावजूद कई मामलों में उत्पाद का मूल स्वरूप और चीनी सामग्री काफी हद तक बरकरार रहती है।

कितना बड़ा है कथित ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क?

नवारो की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस तरह की कथित अवैध माल ढुलाई का वार्षिक मूल्य 40 अरब डॉलर से लेकर 303 अरब डॉलर तक हो सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक यह चलन 2018 के बाद ज्यादा बढ़ा, जब तत्कालीन ट्रंप प्रशासन ने चीन पर अनुचित व्यापारिक गतिविधियों के आरोप लगाते हुए अमेरिकी कानून की धारा 301 के तहत टैरिफ लगाए थे।

अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि चीन ने इन शुल्कों से बचने के लिए वैकल्पिक सप्लाई रूट और तीसरे देशों का इस्तेमाल बढ़ाया।

भारत की मैन्युफैक्चरिंग बेल्ट का भी जिक्र

अमेरिकी रिपोर्ट में भारत की पुणे-गुजरात-चेन्नई उत्पादन पट्टी का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है।

रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत में पंप और कंप्रेसर जैसे उत्पादों की मांग तथा उत्पादन श्रृंखला में चीनी सामान की मौजूदगी अमेरिकी उद्योगों पर असर डाल सकती है।

नवारो ने उदाहरण देते हुए भारत में बिकने वाले कथित चीनी पंपों और अमेरिका के सिनसिनाटी, डेटन तथा कोलंबस जैसे औद्योगिक क्षेत्रों के बीच प्रतिस्पर्धा का मुद्दा उठाया।

अमेरिकी पक्ष का तर्क है कि यदि चीन से आने वाला सामान तीसरे देश के रास्ते अमेरिकी बाजार तक पहुंचता है, तो इससे अमेरिकी निर्माताओं को नुकसान हो सकता है।

अमेरिका अब AI से पकड़ेगा संदिग्ध शिपमेंट

अमेरिका ने इस कथित नेटवर्क की निगरानी के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करने की योजना भी सामने रखी है।

पीटर नवारो के अनुसार अमेरिकी प्रशासन AI आधारित ‘डिटेक्टिव बॉर्डर’ सिस्टम तैनात करने की दिशा में काम कर रहा है।

यह सिस्टम संदिग्ध सामान की पहचान के लिए कई तरह के आंकड़ों का विश्लेषण कर सकता है, जिनमें:

  • शिपमेंट डेटा
  • सामान की रूटिंग हिस्ट्री
  • उत्पाद का वर्गीकरण
  • संबंधित देश की उत्पादन क्षमता
  • व्यापारिक रिकॉर्ड
  • सप्लाई चेन से जुड़े अन्य संकेत

शामिल हो सकते हैं।

इसका उद्देश्य ऐसे सामान की पहचान करना है, जो तीसरे देश से भेजा गया हो लेकिन वास्तव में उसका मूल चीन से जुड़ा होने का संदेह हो।

भारत-अमेरिका व्यापार पर क्या असर पड़ेगा?

भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंध पहले से ही टैरिफ और बाजार पहुंच को लेकर संवेदनशील दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में भारत का नाम इस अमेरिकी रिपोर्ट में आने से दोनों देशों के बीच व्यापारिक बातचीत पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

अगर अमेरिकी प्रशासन इन आरोपों के आधार पर भारतीय निर्यातकों या कुछ उत्पादों की अतिरिक्त जांच करता है, तो इससे कंपनियों की लागत और निर्यात प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका आगे किस तरह की जांच और कार्रवाई करता है।

चीन के खिलाफ अमेरिका की रणनीति और सख्त

पूरे मामले को चीन के साथ अमेरिका के लंबे समय से चले आ रहे व्यापार विवाद के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

अमेरिकी प्रशासन चीन पर व्यापार असंतुलन, सब्सिडी और अनुचित व्यापारिक गतिविधियों से जुड़े आरोप लगाता रहा है। अब तीसरे देशों के रास्ते चीनी सामान के अमेरिकी बाजार में पहुंचने की आशंका को भी इसी रणनीति का हिस्सा बनाया जा रहा है।

अमेरिका का संदेश साफ है कि केवल चीन से सीधे आने वाले सामान पर टैरिफ लगाना पर्याप्त नहीं माना जा रहा। तीसरे देशों के रास्ते होने वाले संभावित व्यापारिक रास्तों पर भी निगरानी बढ़ाई जाएगी।

अब आगे क्या?

भारत के लिए यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका उसके प्रमुख निर्यात बाजारों में से एक है। यदि अमेरिकी प्रशासन तीसरे देशों से आने वाले सामान की जांच और सख्त करता है, तो भारतीय कंपनियों को अपने उत्पादों की मूल उत्पत्ति और सप्लाई चेन से जुड़े दस्तावेजों को लेकर अधिक पारदर्शिता रखनी पड़ सकती है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि अमेरिका की ओर से लगाए गए इन आरोपों के बाद भारत की प्रतिक्रिया क्या होती है और क्या दोनों देशों के बीच टैरिफ को लेकर चल रही बातचीत पर इसका कोई सीधा असर पड़ता है।

अमेरिका का आरोप चीन और तीसरे देशों के बीच कथित ‘शैडो ट्रांसशिपमेंट’ पर केंद्रित है, लेकिन इसका असर भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर पड़ना तय माना जा रहा है।