बिलासपुर। आईपीएस अधिकारी रतनलाल डांगी केस में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बुधवार को सुनवाई के दौरान जांच प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों पर पुलिस मुख्यालय रायपुर और गृह विभाग के सचिव से जवाब मांगा है। मामले में याचिकाकर्ता की ओर से जांच अधिकारियों की नियुक्ति और उनकी पूर्व पदस्थापना को आधार बनाकर जांच की निष्पक्षता पर आपत्ति जताई गई है।
हाईकोर्ट के इस रुख के बाद अब सरकार को याचिका में लगाए गए आरोपों और जांच से जुड़े विभिन्न बिंदुओं पर अपना पक्ष रखना होगा। मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त 2026 वाले सप्ताह में होने की संभावना है।
जांच अधिकारियों की नियुक्ति पर उठे सवाल
याचिका में बताया गया है कि शिकायत के बाद अक्टूबर 2025 में पुलिस महानिदेशक की ओर से मामले की जांच के लिए आईजीपी आनंद छाबड़ा को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया था। वहीं डीआईजीपी मिलना कुर्रे को सहायक जांच अधिकारी की जिम्मेदारी दी गई थी।
याचिका में इसी दौरान आईपीएस अधिकारी रतनलाल डांगी के निलंबन का भी उल्लेख किया गया है।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय और ऋषभदेव साहू ने हाईकोर्ट में जांच की प्रक्रिया को चुनौती देते हुए निष्पक्ष जांच की मांग रखी।
पूर्व पदस्थापना को लेकर क्या है आपत्ति?
याचिका में जांच अधिकारियों की पूर्व पदस्थापना को महत्वपूर्ण आधार बनाया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट में तर्क दिया गया कि अक्टूबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच डीआईजीपी मिलना कुर्रे, रतनलाल डांगी से एक रैंक नीचे के पद पर पदस्थ थीं।
वहीं, आईजीपी आनंद छाबड़ा उसी अवधि में रतनलाल डांगी के समान रैंक पर पुलिस महानिरीक्षक के पद पर पदस्थ थे।
इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने दोनों अधिकारियों की ओर से की जा रही जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं।
याचिका में प्रमुख आपत्तियां
- जांच अधिकारियों की नियुक्ति की निष्पक्षता पर सवाल।
- पूर्व पदस्थापना को लेकर आपत्ति।
- जांच में कथित पूर्वाग्रह का आरोप।
- जांच अधिकारियों को बदलने की मांग।
- वरिष्ठ आईएएस अधिकारी से जांच कराने का अनुरोध।
- महिला आईएएस अधिकारी को जांच की जिम्मेदारी देने की मांग।
- निलंबन के बाद आरोप पत्र जारी किए जाने की समयसीमा को लेकर सवाल।
‘जांच में पक्षपात’ का लगाया गया आरोप
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि जांच अधिकारी उसके पक्ष के प्रति निष्पक्ष रवैया नहीं अपना रहे हैं। याचिका में जांच प्रक्रिया में कथित पूर्वाग्रह की बात भी कही गई है।
हालांकि, ये सभी आरोप फिलहाल याचिकाकर्ता की ओर से लगाए गए दावे हैं। हाईकोर्ट ने इन आरोपों पर अभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। सरकार का जवाब आने और आगे की सुनवाई के बाद ही अदालत इस संबंध में कोई दिशा तय कर सकती है।
90 दिन में आरोप पत्र को लेकर भी सवाल
मामले में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा निलंबन के बाद आरोप पत्र जारी किए जाने से जुड़ा है। याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया है कि रतनलाल डांगी के निलंबन की तारीख से 90 दिनों के भीतर आरोप पत्र जारी नहीं किया गया।
याचिका में इस पहलू को भी जांच प्रक्रिया पर आपत्ति के आधार के रूप में रखा गया है। अब हाईकोर्ट ने सरकार से निलंबन के बाद की कार्रवाई और आरोप पत्र से संबंधित स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
पहले भी अधिकारियों को दी गई थी आपत्ति
याचिकाकर्ता के अनुसार, जांच को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के संबंधित अधिकारियों के समक्ष आपत्ति आवेदन भी दिए गए थे।
इन आवेदनों में आईजीपी आनंद छाबड़ा और डीआईजीपी मिलना कुर्रे को जांच प्रक्रिया से हटाने की मांग की गई थी। इसके साथ ही मामले की जांच किसी वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और महिला आईएएस अधिकारी से कराने का अनुरोध किया गया था।
याचिका में दावा किया गया है कि आपत्ति आवेदन दिए जाने के बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद याचिकाकर्ता ने न्यायिक हस्तक्षेप के लिए हाईकोर्ट का रुख किया।
अब सरकार के जवाब पर टिकी नजर
12 अगस्त की सुनवाई के बाद मामले में सरकार का पक्ष महत्वपूर्ण हो गया है। हाईकोर्ट ने पुलिस मुख्यालय रायपुर और गृह विभाग के सचिव से जवाब मांगा है।
अब सरकार को जांच अधिकारियों की नियुक्ति, उनकी पूर्व पदस्थापना, आरोप पत्र और निलंबन के बाद हुई कार्रवाई समेत याचिका में उठाए गए अन्य सवालों पर अपना पक्ष रखना होगा।
31 अगस्त वाले सप्ताह में अगली सुनवाई
मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त 2026 वाले सप्ताह में होने की संभावना है। सरकार के जवाब के आधार पर हाईकोर्ट आगे की दिशा तय कर सकता है।
फिलहाल अदालत ने जांच अधिकारियों पर लगाए गए आरोपों को सही या गलत ठहराते हुए कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है। ऐसे में अगली सुनवाई यह तय करने के लिहाज से अहम होगी कि जांच की मौजूदा प्रक्रिया जारी रहेगी या याचिकाकर्ता की ओर से जांच अधिकारियों को बदलने की मांग पर कोई निर्देश दिया जाएगा।

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