August 8, 2026

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कांकेर में ग्रामीणों की मजबूरी! पक्का पुल नहीं बना तो खुद बनाया बांस-लकड़ी का ब्रिज, रोज जोखिम उठाकर नदी पार कर रहे बच्चे और किसान

कांकेर। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में विकास की जमीनी हकीकत दिखाने वाली तस्वीर सामने आई है। भानुप्रतापपुर क्षेत्र के ग्राम पंचायत बांसकुंड के साईमुंडा गांव में वर्षों से पक्के पुल का इंतजार कर रहे ग्रामीणों ने आखिरकार खुद ही नदी पर अस्थायी पुल बना लिया। बांस और लकड़ियों से तैयार यह पुल अब ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी का सहारा बना हुआ है।

स्कूली बच्चे हों या किसान, महिलाएं हों या बुजुर्ग—गांव के लोग इसी अस्थायी पुल के जरिए नदी पार कर स्कूल, खेत, बाजार और जरूरी सेवाओं तक पहुंच रहे हैं। बारिश के दिनों में नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ यह रास्ता और भी खतरनाक हो जाता है।

पक्का पुल नहीं बना तो ग्रामीणों ने खुद उठाया जिम्मा

ग्रामीणों के अनुसार नदी और नाले पर लंबे समय से स्थायी पुल की जरूरत महसूस की जा रही है। पहले लोगों को एनीकट के पिल्लरों से जोखिम उठाकर पार जाना पड़ता था या फिर पानी के बीच से होकर नदी पार करनी पड़ती थी।

बच्चों और अन्य ग्रामीणों की परेशानी को देखते हुए गांव के लोगों ने आपसी सहयोग से बांस और लकड़ियों का अस्थायी पुल तैयार किया। हालांकि यह पुल केवल पैदल आने-जाने के काम आता है। किसी वाहन को इससे पार ले जाना संभव नहीं है।

यही वजह है कि किसी आपात स्थिति में ग्रामीणों की परेशानी कई गुना बढ़ जाती है।

बीमार को खाट पर उठाकर नदी पार कराने की मजबूरी

ग्राम पंचायत बांसकुंड के उपसरपंच मनोज कुमार यादव के अनुसार गांव में यदि कोई व्यक्ति बीमार पड़ जाए तो उसे खाट पर उठाकर नदी पार करानी पड़ती है।

उन्होंने बताया कि स्कूली बच्चे इसी अस्थायी पुल से होकर पढ़ने जाते हैं। किसानों को खाद और बीज तक पीठ पर लादकर नदी पार ले जाना पड़ता है।

ग्रामीणों का कहना है कि बारिश के दौरान पुल पर चलना बेहद जोखिम भरा हो जाता है। ऐसे में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर हमेशा चिंता बनी रहती है।

कई बार आवेदन, फिर भी नहीं बनी सड़क-पुल की बात

ग्रामीणों का दावा है कि पक्के पुल के निर्माण के लिए जिला पंचायत, कलेक्टर कार्यालय और जनप्रतिनिधियों के सामने कई बार आवेदन दिए जा चुके हैं।

आवेदन की पावती और संबंधित दस्तावेज भी ग्रामीणों के पास मौजूद हैं। इसके बावजूद अब तक उन्हें मुख्य रूप से आश्वासन ही मिला है।

गांव के लोगों का कहना है कि पुल बन जाने से उनकी रोजमर्रा की सबसे बड़ी समस्या दूर हो सकती है। इसके बावजूद वर्षों से मामला आगे नहीं बढ़ पाया।

पूर्व सरपंच ने भी कई बार उठाया मुद्दा

जनपद पंचायत भानुप्रतापपुर की जनपद सदस्य एवं महिला एवं बाल विकास सभापति सरोज मरकाम ने बताया कि सरपंच रहते हुए उन्होंने दो बार पुल निर्माण के लिए आवेदन किया था।

उनके अनुसार अधिकारियों ने कई बार मौके पर पहुंचकर स्थिति का निरीक्षण और नाप-जोख भी की, लेकिन इसके बाद निर्माण की दिशा में अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।

उन्होंने बताया कि जनपद सदस्य बनने के बाद भी उन्होंने इस मुद्दे को लगातार उठाया। ग्रामीणों की समस्या को लेकर मंत्रालय तक वीडियो भेजकर जानकारी दी गई। अब ग्रामीणों के साथ कलेक्टर से मुलाकात करने और जरूरत पड़ने पर मंत्रालय जाने की तैयारी की जा रही है।

विधायक ने कहा- स्वीकृति मिल चुकी, बारिश के बाद शुरू होगा काम

भानुप्रतापपुर विधायक सावित्री मंडावी ने भी ग्रामीणों की परेशानी को गंभीर बताया है। उन्होंने कहा कि गांव के बच्चों और महिलाओं को जोखिम भरे अस्थायी बांस के पुल का इस्तेमाल करना पड़ता है।

विधायक के अनुसार पिछले दो वर्षों से संबंधित अधिकारियों, सचिवों और मंत्रालय स्तर पर पक्के पुल के निर्माण के लिए प्रयास किए जा रहे थे। विधानसभा में भी याचिका के माध्यम से यह मुद्दा उठाया गया।

उन्होंने दावा किया कि पुल निर्माण की स्वीकृति हो चुकी है और बारिश का मौसम खत्म होने के बाद निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा।

ग्रामीणों को अब पक्के पुल का इंतजार

साईमुंडा के ग्रामीणों के लिए अस्थायी पुल कोई सुविधा नहीं, बल्कि मजबूरी है। इसी पुल के सहारे बच्चे स्कूल जाते हैं, किसान खेतों तक पहुंचते हैं और ग्रामीण रोजमर्रा के जरूरी काम पूरे करते हैं।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि बारिश के दौरान नदी का जलस्तर बढ़ने पर इस अस्थायी रास्ते का इस्तेमाल करना जान जोखिम में डालने जैसा हो सकता है। वाहन नहीं जा पाने के कारण गंभीर मरीजों या अन्य आपात परिस्थितियों में समस्या और बढ़ जाती है।

ग्रामीणों की प्रमुख परेशानियां

  • वर्षों से पक्के पुल का इंतजार
  • बच्चों को जोखिम लेकर स्कूल जाना
  • किसानों को खाद-बीज पीठ पर ढोना
  • बीमार लोगों को खाट पर नदी पार कराना
  • बारिश में बढ़ जाता है खतरा
  • अस्थायी पुल से वाहन नहीं गुजर सकते
  • कई बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से की गई मांग

अब ग्रामीणों की उम्मीद पक्के पुल के निर्माण की स्वीकृति पर टिकी है। यदि तय योजना के अनुसार बारिश के बाद निर्माण शुरू होता है, तो साईमुंडा और आसपास के लोगों को वर्षों पुरानी समस्या से राहत मिल सकती है। फिलहाल बांस और लकड़ियों से बना यह पुल ग्रामीणों की मजबूरी और लंबे समय से अधूरे पड़े बुनियादी ढांचे की तस्वीर सामने ला रहा है।