कभी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की जीवनरेखा कही जाने वाली खारुन नदी आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। जिस नदी का पानी कभी लोगों के पीने, नहाने और खेती के लिए उपयोग होता था, वही नदी अब प्रदूषण, अतिक्रमण और अव्यवस्थित विकास की मार झेल रही है।
महादेव घाट से लेकर सोमनाथ तक के नदी तट का दृश्य यह बताने के लिए काफी है कि खारुन अब केवल एक नदी नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संकट की जीवंत तस्वीर बन चुकी है।
नदी नहीं, जलकुंभी का विशाल मैदान
महादेव घाट से यात्रा शुरू होते ही नदी की बदहाली साफ दिखाई देने लगती है। कई किलोमीटर तक नदी का वास्तविक जल प्रवाह दिखाई नहीं देता। उसकी जगह जलकुंभी की मोटी परत ने पूरे जल क्षेत्र को ढक लिया है।
रायपुरा, सरोना और चंदनडीह के आसपास नदी का बड़ा हिस्सा हरे रंग की जलकुंभी से भर चुका है। कई जगहों पर पानी का बहाव लगभग समाप्त हो चुका है।
नदी में दिखाई देने वाली प्रमुख समस्याएं:
- जलकुंभी का अनियंत्रित फैलाव
- प्लास्टिक और घरेलू कचरे का जमाव
- शहर के गंदे नालों का सीधा प्रवाह
- औद्योगिक अपशिष्ट का मिलना
- प्राकृतिक जल प्रवाह में कमी
गंदे पानी में नहाने को मजबूर ग्रामीण
नदी किनारे बसे कई गांव आज भी स्वच्छ पानी की कमी से जूझ रहे हैं। कुछ स्थानों पर ग्रामीण उसी प्रदूषित पानी का उपयोग स्नान और अन्य घरेलू जरूरतों के लिए करने को मजबूर हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि करीब डेढ़ दशक पहले तक खारुन का पानी साफ और उपयोग योग्य था। नदी में पर्याप्त जल प्रवाह होता था और लोग इसका पानी पीने तक इस्तेमाल करते थे।
एनीकेट और अतिक्रमण ने रोका प्राकृतिक प्रवाह
विशेषज्ञों के अनुसार नदी के प्राकृतिक बहाव में बाधा बनने वाले एनीकेट और नदी तट पर बढ़ते अतिक्रमण ने भी स्थिति को गंभीर बनाया है।
कई स्थानों पर:
- फार्म हाउसों की घेराबंदी नदी तक पहुंच रोक रही है।
- ईंट भट्ठों का विस्तार नदी तट तक पहुंच चुका है।
- खेती और निजी निर्माण के कारण नदी का प्राकृतिक मार्ग प्रभावित हुआ है।
भूजल भी हो रहा प्रभावित
कुछ क्षेत्रों में केवल नदी ही नहीं बल्कि भूजल की गुणवत्ता पर भी असर दिखाई देने लगा है। स्थानीय निवासियों के अनुसार कई जगहों पर पीने योग्य पानी के लिए अब टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
यह स्थिति केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा भी बनती जा रही है।
प्रदूषण के पीछे कई कारण
विशेषज्ञ मानते हैं कि नदी की वर्तमान स्थिति के लिए कई कारक जिम्मेदार हैं।
प्रमुख कारण:
- बिना उपचार के सीवेज का नदी में प्रवाह।
- औद्योगिक अपशिष्ट प्रबंधन में कमी।
- प्लास्टिक प्रदूषण।
- जलकुंभी नियंत्रण की प्रभावी व्यवस्था का अभाव।
- नदी तटों पर अतिक्रमण।
समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी
नदी संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। इसके लिए स्थानीय समुदाय, उद्योग, प्रशासन और आम नागरिकों को मिलकर काम करना होगा।
जरूरी कदम:
- गंदे नालों को उपचार के बाद ही नदी में छोड़ा जाए।
- औद्योगिक प्रदूषण पर सख्त निगरानी हो।
- नदी तटों से अतिक्रमण हटाया जाए।
- जलकुंभी हटाने के लिए नियमित अभियान चलाए जाएं।
- लोगों में नदी संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए।
अभी नहीं संभले तो इतिहास बन जाएगी खारुन
करीब 90 किलोमीटर की यात्रा तय करने वाली खारुन नदी हजारों लोगों के जीवन, खेती और जल स्रोत से जुड़ी हुई है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह नदी केवल बरसात के मौसम में दिखाई देने वाली मौसमी धारा बनकर रह सकती है।
खारुन को बचाना केवल एक नदी को बचाना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के जल और पर्यावरणीय भविष्य को सुरक्षित रखना है।

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