कोदो-कुटकी खेती
भारत में एक बार फिर पारंपरिक और पौष्टिक अनाजों की ओर लोगों का रुझान तेजी से बढ़ रहा है। खासकर छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्यों में कोदो और कुटकी जैसी मिलेट फसलें किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर उभर रही हैं। कम लागत, कम पानी और बेहतर बाजार मूल्य के कारण इन फसलों की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में मिलेट आधारित खेती किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ पोषण सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
क्यों बढ़ रही है कोदो-कुटकी की मांग?
कोदो और कुटकी सदियों से ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के भोजन का हिस्सा रहे हैं। लेकिन अब शहरी क्षेत्रों में भी इनकी मांग तेजी से बढ़ रही है।
इसके पीछे कई बड़े कारण हैं:
स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता
मधुमेह और मोटापे जैसी बीमारियों में लाभकारी
ग्लूटेन फ्री अनाज होने के कारण बढ़ती लोकप्रियता
अंतरराष्ट्रीय बाजार में मिलेट उत्पादों की मांग
सरकार की प्रोत्साहन योजनाएं
इसी वजह से इन्हें आज “सुपर फूड” की श्रेणी में रखा जा रहा है।
कम पानी और कम लागत में तैयार होती है फसल
कोदो और कुटकी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनकी खेती कम संसाधनों में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है।
इन फसलों के लिए:
अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती।
कम उपजाऊ जमीन में भी अच्छी पैदावार मिल जाती है।
पथरीली और ढालू भूमि में भी खेती संभव है।
उत्पादन लागत अपेक्षाकृत कम रहती है।
यही कारण है कि छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह फसल आर्थिक सुरक्षा का मजबूत विकल्प बन रही है।
पोषण का खजाना हैं कोदो और कुटकी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार कोदो और कुटकी पोषण से भरपूर अनाज हैं।
कोदो में पाए जाते हैं:
प्रोटीन
आयरन
कैल्शियम
कार्बोहाइड्रेट
एंटीऑक्सीडेंट तत्व
कुटकी में मौजूद होते हैं:
फाइबर
फास्फोरस
प्रोटीन
खनिज तत्व
आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व
इनका नियमित सेवन शरीर को ऊर्जा देने के साथ कई बीमारियों के जोखिम को कम करने में सहायक माना जाता है।
किसानों को मिल रहा बेहतर समर्थन मूल्य
सरकार द्वारा मिलेट फसलों को बढ़ावा देने के लिए समर्थन मूल्य भी तय किए गए हैं।
वर्ष 2026 में:
कोदो का न्यूनतम समर्थन मूल्य 3200 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है।
कुटकी का समर्थन मूल्य 3350 रुपये प्रति क्विंटल रखा गया है।
इससे किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ मिलने की संभावना बढ़ी है।
अच्छी पैदावार के लिए अपनाएं ये तरीके
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार यदि किसान आधुनिक तकनीकों का उपयोग करें तो उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
बेहतर उत्पादन के लिए:
जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के पहले पखवाड़े तक बुवाई करें।
बीजोपचार अवश्य करें।
कतार पद्धति अपनाएं।
संतुलित उर्वरकों का उपयोग करें।
समय पर खरपतवार नियंत्रण करें।
इन उपायों से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार संभव है।
बाजार में तेजी से बढ़ रही मांग
आज कोदो और कुटकी से बने कई उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं।
जैसे:
कुकीज़
बिस्किट
नूडल्स
रेडी-टू-कुक फूड
हेल्थ ड्रिंक
ब्रेकफास्ट सीरियल
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इन उत्पादों की बढ़ती मांग किसानों के लिए नए अवसर पैदा कर रही है।
भविष्य की खेती बन सकती है मिलेट खेती
जलवायु परिवर्तन और घटते जल संसाधनों के दौर में कोदो और कुटकी जैसी फसलें टिकाऊ कृषि मॉडल का मजबूत आधार बन सकती हैं।
ये फसलें केवल किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि पोषण सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का भी प्रभावी रास्ता हैं।
कोदो और कुटकी सिर्फ अनाज नहीं, बल्कि स्वस्थ समाज, मजबूत कृषि व्यवस्था और समृद्ध भविष्य की नई पहचान बनते जा रहे हैं।

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