श्रीनगर. जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को जमीन का मालिकाना हक देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, 1947 के बाद 5,400 परिवार पाकिस्तान से जम्मू के सीमावर्ती क्षेत्रों में आए थे। अधिकांश हिंदू और सिख थे। ये परिवार कठुआ, सांबा और जम्मू जिलों में बस गए। 1954 में जम्मू, सांबा और कठुआ में इन्हें 46,666 कनाल (5,833 एकड़) जमीन दी गई थी, लेकिन 68 साल बीतने के बाद भी जमीन का मालिकाना हक नहीं मिला। दरअसल, इन्हें जम्मू-कश्मीर का नागरिक नहीं माना जाता था। न जमीन खरीदने का हक था और न ही सरकारी नौकरी करने का। अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद सरकार ने इन्हें यहां का बाशिंदा माना। सरकार ने शरणार्थियों को प्रति परिवार 5.5 लाख रुपए भी दिए हैं। पिछले कुछ दशकों में शरणार्थी परिवारों की संख्या बढ़कर 22,000 हो गई है। इसलिए यह एक मजबूत वोट बैंक बनकर उभरा है। राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक, इन्हें वोटिंग का अधिकार मिलने से विधानसभा चुनाव में भाजपा को फायदा हो सकता है। क्योंकि, अनुच्छेद 370 के दौरान इनके पास विधानसभा चुनाव में वोट डालने का हक नहीं था। करीब 6 विधानसभा सीटों पर इनके वोट निर्णायक साबित हो सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के अधिकारियों के मुताबिक, राजस्व विभाग ने मालिकाना अधिकारों के आवंटन के तौर-तरीकों पर काम करने के लिए एक अभ्यास शुरू किया था। इसके तहत, शरणार्थियों और उनके परिवारों की संख्या, उनके कब्जे के तहत कुल जमीन, उस भूमि की स्थिति और अन्य सूचनाओं का डेटा तैयार किया जा रहा है। इसी आधार पर मालिकाना हक देने की प्रक्रिया शुरू हुई है।
राजस्व विभाग ने जम्मू, सांबा और कठुआ जिला प्रशासन को निर्देश दिया है कि वे सभी प्रोसेस जल्द से जल्द पूरी करें। एक सरकारी सूत्र ने बताया कि आने वाले महीने में एक बड़े समारोह में इन्हें मालिकाना हक देने की औपचारिक घोषणा की जाएगी।

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