शिवाजी और मुग़लों की लड़ाई को हमेशा धार्मिक रंग दिया जाता है जबकि सच्चाई इससे कोसों दूर है। दोनों के बीच वर्चस्व और सत्ता की लड़ाई थी।
नई दिल्ली//दि बीबीसी लाइव :
शिवाजी महाराज के पिता शाह जी और दादा मालोजी बीजापुर के सुल्तान की सेना के एक कमांडर थे। उनकी बहादुरी से खुश होकर आदिल शाह ने पुणे की जागीर सौंप दी और सर लश्कर नाम की सेना की एक टुकड़ी का प्रमुख बना दिया।
मालोजी कई साल तक बिना औलाद के रहे। हज़रत शाह शरीफ़ के आशीर्वाद से दो बेटे हुए। मालोजी ने अपने दोनो बेटो का नाम हज़रत के नाम पर रखा एक नाम शाहजी और दूसरे का नाम शरीफ जी।
मालोजी के बाद शाहजी ने पुणे की जागीर सम्भाली और बीजापुर की सुल्तान के सेनापति अम्बर मलिक के अंदर कमांडर रहे। शाहजहां ने जब बीजापुर पर हमला किया तो शाह कुछ वक़्त के लिए मुग़ल सेना में शामिल हो गए इनाम के तौर पर उन्हें बंगलोर की जागीर मिली। लेकिन कुछ समय बाद ही मुग़ल सेना छोड़ वापस अम्बर मलिक के साथ चले गए।
यहां तक लड़ाई मुग़लो और आदिल शाह के बीच थी लेकिन जैसे ही पुणे की जागीर शिवाजी के पास आई वो आस पास की जागीर पर भी हमला कर अपना राज बढ़ाने की कोशिश करने लगे जिसके लिए बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी को गिरफ्तार कर लिया और इस शर्त पर छोड़ा की दोबारा पुणे से बाहर किसी दूसरे जागीर पर क़ब्ज़ा नही करेंगे।
लेकिन शिवाजी माने नही जिसकी वजह से उनके पिता शाह जी ने उनसे ख़ुद को अलग कर लिया और पुणे छोड़कर दूसरे बेटे के पास चले गए। इधर मुग़लो ने बीजापुर फ़तह कर आदिलशाह को सत्ता से बेदखल कर दिया। शिवाजी ने आदिलशाह के बचे हुए अफ़ग़ान लड़ाकों को अपनी सेना में शामिल कर लिया।
दक्कन में अब मुग़लों और मराठों की बीच संघर्ष शुरू हो गया इधर औरंगज़ेब के साथ जयसिंह, उदयभान जैसे कई बड़े राजपूत और उनकी सेना थी तो उधर शिवाजी की अफ़ग़ान लडको की सेना थी।
असद अली समाजसेवी व इतिहासकार आगे लिखते हैं —
औरंगज़ेब जब तक जिंदा थे तब मुग़ल मराठों पर हावी थे औरंगजेब की वफ़ात के बाद मराठे मुग़लो पर हावी हो गए। सत्ता का संघर्ष यूँही चलता रहा इसमे कही धर्मयुद्ध जैसा नही जैसा की आज हिंदी फिल्मों और नेताओ द्वारा परोसा जाता है।

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