August 24, 2026

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तबादले की हड़बड़ी में बड़ा खेल! जिस अधिकारी को अधिकार ही नहीं, उसके नाम से जारी हुआ फर्जी ट्रांसफर आदेश

बलौदा बाजार। छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार जिले के पलारी क्षेत्र में सामने आए कथित फर्जी ट्रांसफर आदेश के मामले ने सरकारी तबादलों की प्रक्रिया और राजनीतिक पहुंच को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। रोहान्सी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ ग्रामीण स्वास्थ्य सहायक करण कुमार देवांगन के नाम से जारी कथित स्थानांतरण आदेश की जांच के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है।

मामला सामने आने के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर ऐसा आदेश तैयार कैसे हुआ और उसे सरकारी आदेश के तौर पर संबंधित स्वास्थ्य केंद्र तक कैसे पहुंचाया गया। पुलिस की जांच अब कथित दस्तावेज तैयार करने, उसे इस्तेमाल करने और पैसों के लेनदेन से जुड़े पहलुओं पर भी केंद्रित है।

विवाद से शुरू हुई तबादले की कहानी

बताया गया है कि 28 जुलाई को रोहान्सी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ आरएमए करण देवांगन और नगर पंचायत रोहान्सी के अध्यक्ष नंदेश्वर साहू के बीच विवाद हुआ था। देवांगन ने इसके बाद अधिकारियों के समक्ष सुरक्षा को लेकर शिकायत की।

मामले की जांच के लिए एसडीएम पलारी के नेतृत्व में टीम गठित की गई थी। बाद में आपसी सहमति और क्षेत्र के विकास को लेकर विवाद को सुलझाने की कोशिश भी हुई।

हालांकि, इसके बाद देवांगन ने रोहान्सी में खुद को असुरक्षित बताते हुए तबादले की मांग की। यहीं से कथित तौर पर तबादला कराने के लिए राजनीतिक संपर्कों का इस्तेमाल किए जाने की कहानी सामने आती है।

भाजपा नेताओं तक पहुंची तबादले की बात

जानकारी के मुताबिक, देवांगन ने अपने परिचित और कसडोल में पदस्थ आरएमए रवि सेन से अपनी परेशानी साझा की। इसके बाद कथित तौर पर तबादले की बात भाजपा के स्थानीय नेताओं तक पहुंची।

आरोप है कि भाजपा उपाध्यक्ष पुनी राम पटेल और जिला महामंत्री कृष्णा अवस्थी के स्तर पर स्वास्थ्य मंत्री और डिप्टी सीएम के नाम का हवाला देते हुए तबादला कराने का भरोसा दिया गया।

हालांकि, इन आरोपों की वास्तविकता और संबंधित नेताओं की भूमिका का अंतिम निर्धारण पुलिस जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।

17 अगस्त को मिला कथित ट्रांसफर आदेश

बताया जा रहा है कि 17 अगस्त को करण देवांगन को एक तबादला आदेश मिला। इसमें उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मोपर, विकासखंड भाटापारा भेजे जाने का उल्लेख था।

आदेश देखने के बाद उन्हें इसकी वैधता को लेकर संदेह हुआ। इसके बाद उन्होंने कथित तौर पर संबंधित भाजपा नेताओं से इसकी जानकारी ली। मामले में यह भी दावा सामने आया कि उन्हें जल्द ही स्थिति स्पष्ट होने और अधिकारियों को निर्देश दिए जाने का भरोसा दिया गया।

स्वास्थ्य मंत्री से मुलाकात कराने के लिए उन्हें बलौदा बाजार स्थित सर्किट हाउस ले जाने की बात भी सामने आई है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को लेकर सामने आए दावों की पुष्टि जांच के निष्कर्षों से ही होगी।

BMO के पास पहुंचा आदेश तो खुला राज

मामले में अहम मोड़ तब आया जब करण देवांगन कथित तबादला आदेश लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पलारी पहुंचे और बीएमओ डॉ. पंकज वर्मा से मुलाकात की।

बीएमओ ने आदेश को लेकर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. राजेश अवस्थी से जानकारी ली। इसके बाद कथित आदेश की वैधता पर सवाल खड़े हुए।

शिकायत के अनुसार:

  • आदेश क्रमांक एच.एम./ए.आर./2026-27/1359, दिनांक 14 अगस्त 2026 बताया गया।
  • इसमें करण कुमार देवांगन का स्थानांतरण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मोपर, विकासखंड भाटापारा दर्शाया गया था।
  • जांच में दावा किया गया कि CMHO कार्यालय से ऐसा कोई आदेश जारी नहीं हुआ था।
  • आदेश पर मौजूद हस्ताक्षर भी कथित तौर पर फर्जी पाए गए।
  • राज्य संवर्ग के कर्मचारी के तबादले के अधिकार क्षेत्र को लेकर भी सवाल उठाए गए।

पुलिस जांच के बाद दर्ज हुआ मामला

बीएमओ डॉ. पंकज वर्मा की शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। बताया गया है कि जांच के दौरान कथित रूप से कूटरचित दस्तावेज तैयार कर उसे वास्तविक सरकारी आदेश के रूप में इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई।

इसी आधार पर पलारी थाने में अपराध क्रमांक 347/2026 दर्ज किया गया। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4), 336(3), 337, 338, 340(2) और 3(5) के तहत मामला दर्ज कर विवेचना शुरू की है।

मामले में यह भी सामने आया कि पुलिस में अपराध दर्ज होने से पहले ही करण देवांगन की ओर से अग्रिम जमानत के लिए आवेदन लगाया गया था। केस डायरी से संबंधित जानकारी न्यायालय द्वारा तलब किए जाने के बाद यह तथ्य सामने आने की बात कही गई है।

अब जांच के सामने कई बड़े सवाल

यह मामला केवल एक कथित फर्जी दस्तावेज तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा है। जांच में कई अहम सवालों के जवाब तलाशे जाने हैं:

  • कथित फर्जी ट्रांसफर आदेश किसने तैयार किया?
  • सरकारी कार्यालय के आदेश जैसा दस्तावेज बनाने के लिए किन जानकारियों का इस्तेमाल किया गया?
  • फर्जी हस्ताक्षर किसने किए?
  • आदेश तैयार कराने और इस्तेमाल करने के पीछे किसकी भूमिका थी?
  • क्या इस पूरे मामले में पैसों का लेनदेन हुआ?
  • राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करने के आरोपों में कितनी सच्चाई है?
  • आखिर ऐसे व्यक्ति के नाम से तबादला आदेश क्यों तैयार किया गया, जिसके कार्यालय को तबादले का अधिकार नहीं था?

फिलहाल पुलिस की विवेचना जारी है। इसलिए मामले में सामने आए आरोपों को अंतिम सत्य मानने के बजाय जांच और न्यायालय के निष्कर्ष का इंतजार करना जरूरी है। लेकिन जिस तरह कथित फर्जी ट्रांसफर आदेश सरकारी दस्तावेज के रूप में सामने आया, उसने प्रशासनिक व्यवस्था और तबादला प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।