कारोबारी घराने
भारत की अर्थव्यवस्था में उदारीकरण के बाद प्रतिस्पर्धा बढ़ने की बात अक्सर कही जाती है, लेकिन बड़ी कंपनियों और कारोबारी समूहों के दबदबे को लेकर सामने आए आंकड़े एक अलग तस्वीर दिखाते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक, देश के कॉरपोरेट कारोबार में कुछ बड़े पारिवारिक कारोबारी समूहों की हिस्सेदारी बेहद प्रभावशाली रही है।
अध्ययन में 2001 से 2020 के बीच भारत के बड़े कारोबारी समूहों के विस्तार और विभिन्न उद्योगों में उनकी मौजूदगी का विश्लेषण किया गया है। इसमें रिलायंस, अडानी, टाटा, आदित्य बिड़ला और जिंदल जैसे पांच प्रमुख कारोबारी घरानों का खास तौर पर उल्लेख किया गया है।
नोट: यहां 60% से अधिक का आंकड़ा कुल कॉरपोरेट रेवेन्यू/व्यावसायिक आय में अध्ययन के दायरे के अनुसार समूहों की हिस्सेदारी से संबंधित है। इसे भारत की पूरी अर्थव्यवस्था या GDP का 60% नहीं समझना चाहिए।
कौन हैं भारत के ‘बिग 5’ कारोबारी घराने?
अध्ययन के अनुसार, इन पांच बड़े कारोबारी समूहों ने दो दशकों के दौरान भारतीय कारोबार के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाई।
इनमें शामिल हैं:
- रिलायंस ग्रुप
- अडानी ग्रुप
- टाटा ग्रुप
- आदित्य बिड़ला ग्रुप
- ओपी जिंदल ग्रुप
इन समूहों का कारोबार ऊर्जा, पेट्रोकेमिकल्स, इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टील, दूरसंचार, आईटी, ऑटोमोबाइल, वित्तीय सेवाओं और कई अन्य क्षेत्रों तक फैला हुआ है।
रिलायंस और अडानी सबसे आगे
अध्ययन में बताया गया है कि पांच प्रमुख समूहों में रिलायंस और अडानी समूह की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा प्रभावशाली रही। दोनों समूहों को मिलाकर कुल कारोबारी आय में लगातार बड़ी हिस्सेदारी दर्ज की गई।
वहीं, टाटा और जिंदल समूह की कारोबारी हिस्सेदारी में समय के साथ बढ़ोतरी देखने को मिली। हालांकि, अध्ययन की अवधि में इनकी हिस्सेदारी कुल आय के 10% से नीचे रही।
आदित्य बिड़ला समूह की हिस्सेदारी में अध्ययन के दौरान धीरे-धीरे कमी का उल्लेख किया गया है, लेकिन कई प्रमुख उद्योगों में समूह की मौजूदगी और विविध कारोबार के कारण उसका प्रभाव महत्वपूर्ण बना रहा।
74% से ज्यादा उद्योगों में मजबूत पकड़
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू विभिन्न उद्योगों में इन समूहों का फैलाव है। अध्ययन के मुताबिक, NIC-3 स्तर के 74% से अधिक उद्योगों में इन पांच बड़े समूहों का आधे से ज्यादा रेवेन्यू पर नियंत्रण पाया गया।
इसका मतलब यह है कि इन कारोबारी घरानों का प्रभाव केवल एक-दो क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा। समय के साथ उन्होंने अलग-अलग उद्योगों में निवेश और विस्तार के जरिए अपने कारोबार का दायरा बढ़ाया।
कारोबार के विस्तार की बड़ी वजह क्या रही?
2000 से 2010 के बीच बड़े कारोबारी समूहों ने तेजी से विविधीकरण किया। यानी एक क्षेत्र में कारोबार करने के बजाय उन्होंने कई नए क्षेत्रों में प्रवेश किया।
इस रणनीति के तहत:
- नए उद्योगों में निवेश बढ़ाया गया।
- मौजूदा कंपनियों का विस्तार किया गया।
- अलग-अलग सेक्टर में कारोबार खड़ा किया गया।
- बड़े अधिग्रहण और निवेश के जरिए बाजार में मौजूदगी बढ़ी।
- एक ही कारोबारी समूह के भीतर कई क्षेत्रों को जोड़ा गया।
25 बड़े कारोबारी घरानों का GDP से भी बड़ा कनेक्शन
अध्ययन में एक और दिलचस्प आंकड़ा सामने आता है। वर्ष 2020 में भारत के शीर्ष 25 पारिवारिक कारोबारी घरानों का कुल रेवेन्यू देश की GDP के 15% से अधिक के बराबर बताया गया।
हालांकि, रेवेन्यू और GDP अलग-अलग आर्थिक अवधारणाएं हैं। इसलिए दोनों आंकड़ों की सीधे तुलना करके यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि इन समूहों ने GDP का 15% हिस्सा कमाया। यह आंकड़ा केवल इनके कारोबारी पैमाने को समझने का एक संकेतक है।
उदारीकरण के बाद भी क्यों कायम है दबदबा?
1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय बाजार में निजी कंपनियों और विदेशी निवेश का विस्तार हुआ। इसके बावजूद बड़े कारोबारी घरानों ने भी अपने कारोबार को नए क्षेत्रों में फैलाकर प्रतिस्पर्धा में अपनी स्थिति मजबूत की।
यही कारण है कि आज भारत के कई महत्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्रों में बड़े पारिवारिक कारोबारी समूहों की मौजूदगी दिखाई देती है।
इसका एक सकारात्मक पहलू यह है कि बड़े समूह बड़े पैमाने पर निवेश, रोजगार और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास में योगदान कर सकते हैं। दूसरी ओर, बाजार में कारोबार का अत्यधिक केंद्रीकरण प्रतिस्पर्धा, नए कारोबारों के प्रवेश और आर्थिक शक्ति के वितरण को लेकर सवाल भी खड़े करता है।
क्या यह भारत में एकाधिकार का संकेत है?
सिर्फ बड़े कारोबारी समूहों का बड़ा होना अपने आप में एकाधिकार साबित नहीं करता। किसी बाजार में वास्तविक एकाधिकार या प्रतिस्पर्धा की स्थिति जानने के लिए संबंधित सेक्टर, बाजार हिस्सेदारी, प्रतिस्पर्धी कंपनियों, कीमतों और नियामकीय स्थिति का अलग-अलग विश्लेषण जरूरी होता है।
फिर भी अध्ययन के आंकड़े यह संकेत जरूर देते हैं कि भारत की कॉरपोरेट अर्थव्यवस्था में कुछ बड़े कारोबारी घरानों का प्रभाव काफी व्यापक है।
यही वजह है कि रिलायंस, अडानी, टाटा, बिड़ला और जिंदल जैसे नाम भारतीय कॉरपोरेट जगत की चर्चा में लगातार केंद्र में बने रहते हैं।

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