August 7, 2026

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22 लाख का सौदा फंसा, 10 लाख की बयाना राशि भी नहीं मिली वापस! भिलाई स्टील प्लांट मामले में हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

भिलाई स्टील प्लांट (बीएसपी) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बिलासपुर हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। ई-आक्शन में सफल बोली लगाने वाली एक कंपनी द्वारा बयाना राशि और जीएसटी वापस करने की मांग वाली याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला दो पक्षों के बीच हुए संविदात्मक (कॉन्ट्रैक्ट) विवाद का है और जब अनुबंध में मध्यस्थता (Arbitration) का प्रावधान मौजूद है, तब सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।

यह फैसला उन कारोबारियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो सरकारी या सार्वजनिक उपक्रमों की ई-नीलामी (ई-आक्शन) में भाग लेते हैं और अनुबंध संबंधी विवादों के समाधान के लिए अदालत का रुख करते हैं।

क्या है पूरा मामला?

जानकारी के अनुसार मेसर्स कामधेनु ट्रेडिंग कंपनी की प्रोप्राइटर दीप्ति अग्रवाल ने भिलाई स्टील प्लांट द्वारा आयोजित एक ई-आक्शन में भाग लिया था।

ई-आक्शन में—

  • कंपनी सफल बोलीदाता घोषित हुई।
  • 10 लाख रुपये बयाना राशि (Earnest Money Deposit) जमा की गई।
  • अन्य भुगतान सहित कुल लगभग 22 लाख रुपये जमा किए गए।

बोली सफल होने के बाद कंपनी को निर्धारित शर्तों के अनुसार आगे की प्रक्रिया पूरी करनी थी।

निर्यात शुल्क बढ़ने से बदल गई स्थिति

मामले में मोड़ तब आया जब 21 मई 2022 को केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय ने संबंधित उत्पाद पर निर्यात शुल्क 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया।

कंपनी का कहना था कि—

  • अचानक बढ़े निर्यात शुल्क के कारण व्यापारिक गणना पूरी तरह बदल गई।
  • निर्धारित शर्तों पर कारोबार करना आर्थिक रूप से संभव नहीं रहा।
  • इसलिए जमा की गई राशि वापस की जानी चाहिए।

इसी मांग को लेकर कंपनी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की युगलपीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

अदालत ने कहा कि—

  • यह विवाद मूल रूप से एक संविदात्मक (Contractual) विवाद है।
  • दोनों पक्षों के बीच हुए अनुबंध में मध्यस्थता (Arbitration) का प्रावधान मौजूद है।
  • ऐसे मामलों में पहले अनुबंध में निर्धारित विवाद निपटान प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
  • सीधे अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करना उचित नहीं है।

इन्हीं आधारों पर हाई कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करने से इनकार करते हुए खारिज कर दिया।

अनुच्छेद 226 का क्या महत्व है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226 हाई कोर्ट को विशेष परिस्थितियों में रिट जारी करने का अधिकार देता है।

हालांकि, न्यायालय कई मामलों में यह सिद्धांत अपनाते हैं कि यदि—

  • अनुबंध में विवाद निपटान का वैकल्पिक प्रावधान मौजूद हो,
  • मध्यस्थता या अन्य कानूनी उपाय उपलब्ध हों,

तो पहले उन्हीं प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए।

इस मामले में भी अदालत ने इसी सिद्धांत को लागू किया।

कारोबारियों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

यह निर्णय केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी व्यवसायियों और कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है जो सरकारी एजेंसियों, सार्वजनिक उपक्रमों या ई-आक्शन के माध्यम से कारोबार करते हैं।

इस फैसले से यह संदेश मिलता है कि—

  • ई-आक्शन की शर्तों को पूरी तरह समझकर ही बोली लगानी चाहिए।
  • अनुबंध में मौजूद विवाद समाधान की प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है।
  • संविदात्मक विवादों में सीधे रिट याचिका हमेशा स्वीकार नहीं की जाती।
  • मध्यस्थता जैसी वैकल्पिक कानूनी व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाती है।

व्यापारिक जोखिम और कानूनी प्रक्रिया

सरकारी नीतियों, करों या शुल्कों में बदलाव का असर कई बार पहले से तय व्यापारिक सौदों पर भी पड़ता है। ऐसे मामलों में संबंधित पक्षों के अधिकार और दायित्व अनुबंध की शर्तों के अनुसार तय किए जाते हैं। यदि किसी अनुबंध में मध्यस्थता का प्रावधान शामिल है, तो सामान्यतः उसी प्रक्रिया के माध्यम से विवाद का समाधान करने की अपेक्षा की जाती है।

बिलासपुर हाई कोर्ट का यह फैसला इसी सिद्धांत को दोहराता है कि संविदात्मक मामलों में उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपायों का उपयोग किए बिना सीधे संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार का सहारा लेना उचित नहीं माना जाएगा। यह निर्णय भविष्य में ई-आक्शन और सरकारी अनुबंधों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में देखा जा सकता है।