बिलासपुर में निजी स्कूल संचालकों ने पाठ्य पुस्तकों की उपलब्धता में हो रही देरी के खिलाफ बड़ा आंदोलन शुरू कर दिया है। जिले के 50 से अधिक निजी विद्यालयों के संचालक, प्राचार्य, शिक्षक और कर्मचारी एकजुट होकर सड़क पर उतरे और अपनी मांगों को लेकर जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपा।
निजी विद्यालय संचालक संघ के बैनर तले आयोजित इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में शिक्षण संस्थानों से जुड़े लोग शामिल हुए। आंदोलन की शुरुआत मुंगेली नाका मैदान से हुई, जहां से रैली के रूप में सभी लोग जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा।
आखिर क्यों भड़के निजी स्कूल संचालक?
संघ का कहना है कि राज्य के शासकीय विद्यालयों में नई शैक्षणिक सत्र की किताबें समय पर पहुंच चुकी हैं, जबकि निजी विद्यालयों के विद्यार्थियों को अब तक आवश्यक पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध नहीं हो सकी हैं। इससे हजारों छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
संघ के पदाधिकारियों का आरोप है कि पाठ्य पुस्तक वितरण में गंभीर लापरवाही बरती जा रही है, जिसका खामियाजा निजी स्कूलों के बच्चों को भुगतना पड़ रहा है।
प्रमुख मांगें
निजी विद्यालय संचालकों ने सरकार और संबंधित विभाग के सामने कई महत्वपूर्ण मांगें रखी हैं—
- 5 जुलाई तक सभी आवश्यक पाठ्य पुस्तकें निजी विद्यालयों को उपलब्ध कराई जाएं।
- निजी और सरकारी विद्यालयों के बीच पुस्तक वितरण में समानता सुनिश्चित की जाए।
- भविष्य में पुस्तक वितरण की समयबद्ध व्यवस्था बनाई जाए।
- विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न हो इसके लिए विशेष व्यवस्था की जाए।
पांच महीने में कैसे पूरा होगा दस महीने का पाठ्यक्रम?
संघ के पदाधिकारियों ने बताया कि यदि जुलाई के अंत तक किताबें मिलती हैं तो छात्रों के पास पढ़ाई के लिए केवल पांच से छह महीने का समय ही बचेगा। शिक्षा कैलेंडर के अनुसार फरवरी में परीक्षाएं प्रस्तावित हैं और अप्रैल से नया सत्र शुरू हो जाएगा।
ऐसी स्थिति में शिक्षकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे सीमित समय में पूरा पाठ्यक्रम कैसे पूरा करें। इससे छात्रों के परीक्षा परिणाम और शैक्षणिक गुणवत्ता पर भी असर पड़ सकता है।
प्रदेशव्यापी आंदोलन की चेतावनी
निजी विद्यालय संचालक संघ ने स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित समय सीमा तक किताबें उपलब्ध नहीं कराई गईं तो आंदोलन को पूरे प्रदेश स्तर पर विस्तारित किया जाएगा। संघ ने चेतावनी दी है कि आने वाले दिनों में उग्र प्रदर्शन और धरना-आंदोलन की रणनीति बनाई जा सकती है।
बड़ी संख्या में शामिल हुए शिक्षक और संचालक
इस आंदोलन में जिले के कई निजी विद्यालयों के संचालक, प्राचार्य और शिक्षक शामिल हुए। सभी ने एक स्वर में कहा कि यह लड़ाई केवल स्कूल प्रबंधन की नहीं बल्कि हजारों विद्यार्थियों के भविष्य की है।
शिक्षकों का कहना है कि बिना किताबों के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना संभव नहीं है और सरकार को इस गंभीर समस्या का तत्काल समाधान निकालना चाहिए।
विद्यार्थियों के भविष्य का सवाल
निजी विद्यालयों का कहना है कि यदि समय रहते पुस्तकों की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं हुई तो इसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई और परीक्षा परिणामों पर पड़ेगा। अब सभी की नजर सरकार और पाठ्य पुस्तक वितरण व्यवस्था पर टिकी हुई है कि वह इस समस्या का समाधान कितनी जल्दी कर पाती है।

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