जब खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स के सेमीफाइनल में किरण पिस्दा ने पेनल्टी शूटआउट के दौरान गोलकीपिंग के दस्ताने पहने, तो उनके दिमाग में एक ही विचार था—अपने संघर्ष के दौरान सीखे गए अनुभवों पर भरोसा करना। छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव से निकलकर अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉल की दुनिया में कदम रखने वाली किरण का सफर किसी प्रेरणा से कम नहीं है।
परिवार का समर्थन और पहले कदम
किरण पिस्दा ने अपनी फुटबॉल यात्रा की शुरुआत अपने परिवार के प्रोत्साहन से की। उनके भाई, गिरीश पिस्दा, जो खुद राष्ट्रीय स्तर के फुटबॉलर हैं, ने उन्हें हमेशा प्रेरित किया। किरण का मानना है कि उन्हें स्कूल से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के खेलों में भाग लेने के अवसर मिले, जो उनके आत्मविश्वास के निर्माण में सहायक साबित हुए।
किरण बताती हैं, “मुझे स्कूल में काफी सपोर्ट मिला। वहीं से मुझे राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर खेलने के मौके मिले और हर चयन के साथ मेरा आत्मविश्वास बढ़ता गया।”
राष्ट्रीय शिविर का अनुभव और कठिनाइयां
हालांकि, उनके लिए शुरुआत आसान नहीं थी। शारीरिक रूप से फिट न होने और सीनियर खिलाड़ियों से प्रतिस्पर्धा करने में मानसिक स्तर की कमी के कारण, उन्हें एक राष्ट्रीय शिविर में भारतीय टीम में स्थान नहीं मिला। इस अनुभव ने किरण को आत्म-सुधार की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। वह कहती हैं, “मुझे एहसास हुआ कि वहां जो अनुभव मिला है, उस पर मुझे काम करना होगा।”
मेहनत और मानसिकता में बदलाव
किरण ने अपनी फिटनेस पर काम किया, मैचों का विश्लेषण किया और अपनी पोज़िशनल समझ को बेहतर बनाने के साथ-साथ मानसिक मजबूती पर भी ध्यान दिया। उनकी सफलता की कहानी का मुख्य कारण उनकी मानसिकता में आया यह बदलाव था। वह कहती हैं, “मैंने खुद से कहा कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं नकारात्मक नहीं सोचूंगी। अगर आप नकारात्मक हो जाते हैं, तो उसका सीधा असर आपके प्रदर्शन पर पड़ता है।”
नई पहचान और सफलता
किरण के जीवन में उनके मेंटर और कोच, योगेश कुमार जांगड़ा का बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने हमेशा उन्हें सकारात्मक रहने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उनकी मेहनत का असर धीरे-धीरे दिखने लगा। किरण ने केरल ब्लास्टर्स जैसी बड़ी फुटबॉल टीमों के लिए खेलने का मौका पाया और अपनी बहुमुखी प्रतिभा को साबित किया। उन्होंने कहा, “मैंने स्ट्राइकर के रूप में शुरुआत की, फिर मिडफील्ड में खेली और अब राष्ट्रीय टीम के लिए फुल-बैक के रूप में खेलती हूं।”
अंतर्राष्ट्रीय मंच पर कदम
किरण अब तक भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं और 2022 के सैफ़ चैंपियनशिप स्क्वाड का हिस्सा भी रही हैं। इसके साथ ही, उन्होंने क्रोएशियन महिला लीग में डिनामो ज़ाग्रेब के लिए भी खेला। लेकिन इस सफर में असफलताएं भी रही हैं। हाल ही में, वह ऑस्ट्रेलिया में आयोजित एएफसी महिला एशियन कप जैसे बड़े टूर्नामेंट के लिए चयन में असफल रहीं।
किरण ने इस पर कहा, “बड़े टूर्नामेंट के लिए चयन न होना दुख देता है, लेकिन अब मैं इसे अलग नजरिए से देखती हूं। इसे मैं और मेहनत करने और मजबूत वापसी करने की प्रेरणा मानती हूं।”
दबाव को संभालने की कला
किरण ने यह भी सीखा है कि उच्चतम स्तर पर खेलते हुए दबाव को संभालना बेहद जरूरी है। वह कहती हैं, “ऊंचे स्तर पर खेलते समय दबाव हमेशा रहता है। आपको उसे संभालना सीखना पड़ता है।”
जनजातीय पृष्ठभूमि से एक प्रेरणा
किरण की कहानी इस बात को भी दर्शाती है कि खेलों में प्रतिभा कहीं भी हो सकती है, बस उसे सही मौका और मंच मिलना चाहिए। वह मानती हैं, “जनजातीय इलाकों में बहुत प्रतिभा है, लेकिन खिलाड़ियों को हमेशा मौके नहीं मिलते। खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स ने उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच दिया है। इससे उन्हें आत्मविश्वास और राज्य तथा देश के लिए खेलने का सपना देखने की प्रेरणा मिलती है।”
भविष्य की ओर
किरण का फोकस फिलहाल इंडियन वुमेंस लीग जैसी घरेलू प्रतियोगिताओं में अच्छा प्रदर्शन करने और राष्ट्रीय टीम में नियमित स्थान बनाने पर है। लेकिन उनका लक्ष्य इससे कहीं बड़ा है। वह कहती हैं, “मैं लगातार खुद को बेहतर बनाना चाहती हूं, नियमित प्रदर्शन करना चाहती हूं और बड़े टूर्नामेंट में भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहती हूं। अगर आपका चयन नहीं होता, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप अच्छे खिलाड़ी नहीं हैं—इसका मतलब है कि आपको और मेहनत करनी होगी।”

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