रायपुर। छत्तीसगढ़ में आरक्षण संशोधन विधेयक पर अब राज्य सरकार और राज्यपाल आमने-सामने आ गए हैं। सीएम भूपेश बघेल ने राज्यपाल अनुसुइया उइके पर खुला आरोप लगाया है कि वे हस्ताक्षर नहीं करना चाहती हैं। वे विधेयक को अनिश्चितकाल तक रखना चाहती हैं, लेकिन बहाना ढूंढ रही हैं। यह कतई उचित नहीं है। सीएम ने आशंका जताई है कि राज्यपाल ने जिन 10 बिंदुओं पर जवाब मांगा था, उसे राजभवन भेज दिया गया है, लेकिन उसमें भी मीन-मेख निकाला जा रहा है। अब जो हालात बनते दिख रहे हैं, उसे लेकर जानकारों का कहना है कि मामला सुलझने के बजाय उलझने के आसार हैं, क्योंकि राज्यपाल अभी भी राज्य सरकार की ओर से भेजे गए जवाब से संतुष्ट नजर नहीं आ रहीं, ऐसे में आरक्षण की नई व्यवस्था लागू नहीं हो पाएगी और लंबे समय तक मामला उलझ जाएगा।
मीडिया से बातचीत में सीएम भूपेश बघेल ने कहा, “रमन सिंह जी ने एक राष्ट्रीय अखबार में बयान दिया है, Governor cannot sign the bill on wish of cm…। बिल विभाग तैयार करता है। कैबिनेट में प्रस्तुत होता है। कैबिनेट के अप्रूवल के बाद विधानसभा में एडवाइजरी कमेटी के सामने रखा जाता है। उसके बाद विधानसभा में चर्चा होती है। जहां तक आरक्षण बिल की बात है, सारी प्रक्रिया पूरी की गई है। विधानसभा में सर्व सम्मति से पारित किया गया। ये मुख्यमंत्री की विश से नहीं हुआ है। ये विधानसभा द्वारा सर्व सम्मति से पारित हुआ है। सभी लोगों ने भाग लिया। विपक्ष के ऐसे कोई सदस्य नहीं हैं, जिन्होंने भाषण न किया हो। दुर्भाग्य की बात यह है कि रमन सिंह जैसे नेता, जो 15 साल मुख्यमंत्री रहे, वे कहते हैं कि मुख्यमंत्री की विश से… मुख्यमंत्री की विश से नहीं, ये विधानसभा से पारित हुआ है। ये बिल विधानसभा का है, मुख्यमंत्री का नहीं है।’
“दूसरी बात आज तक भाजपा के एक भी नेता, जब सर्व सम्मति से बिल पारित हुआ है तो गवर्नर से ये नहीं कहा कि इसमें हस्ताक्षर करिये। उन्होंने कभी नहीं कहा। एक भी भाजपा का नेता, ये डेलीगेशन लेकर बार-बार जाते हैं, वहां वे कभी नहीं बोले कि इसमें हस्ताक्षर होना चाहिए। तीसरी बात जो कल मैं बोला कि ये जो विधिक सलाहकार है, वह कौन है? ये विधिक सलाहकार एकात्म परिसर में बैठते हैं। राज्यपाल भाजपा नेताओं के दबाव में हस्ताक्षर नहीं कर रहीं। मेरे सारे अधिकारियों ने कहा कि इन्हें अधिकार ही नहीं है। फिर भी पौने तीन करोड़ जनता के हित को ध्यान में रखते हुए मैंने जवाब भेजवा दिया। अब उसमें पता चल रहा है कि उसमें फिर से मीन मेख निकालेंगे। फिर जवाब भेजा जाएगा, फिर मीन मेख निकालेंगे। कुल मिलाकर राज्यपाल को हस्ताक्षर नहीं करना है।’
“नहीं करना है तो वापस करें बिल। उनके अधिकार क्षेत्र में क्या है? उनके अधिकार क्षेत्र में है कि यदि बिल उचित नहीं लगता तो वापस करें सरकार को, दूसरा, राष्ट्रपति को भेजें, तीसरा अनिश्चितकाल तक रखे रहें। वे (राज्यपाल) अनिश्चितकाल तक रखना चाहती हैं, लेकिन बहाना ढंूढ रही हैं। यह कतई उचित नहीं है। ये सलाहकार विधानसभा से बड़ा हो गया। विधानसभा जो छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी पंचायत है, जिसमें पूरे प्रदेश की जनता का प्रतिनिधित्व विधानसभा करती है, उसमें सर्व सम्मति से बिल पारित किया गया है। विधानसभा में सारे अनुभवी विधायक भी हैं, मंत्री हैं, वकील भी हैं, जिन्होंने एलएलबी किया है। सारी प्रक्रिया वर्षों से छह, सात, आठ बार के विधायक हैं, उन्होंने इसमें भाग लिया और ये विधिक सलाहकार पता नहीं कौन हैं? एकात्म परिसर में बैठता है, वह विधानसभा से बड़ा हो गया है।’

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