April 17, 2026

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नक्सली हमले में शहीद जवान की मां को पेंशन न देना अन्याय: हाई कोर्ट ने सरकार को 6 हफ्ते का समय दिया

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने नक्सली हमले में शहीद हुए एक पुलिस कांस्टेबल की 68 साल की मां को पारिवारिक पेंशन नहीं देने को अन्यायपूर्ण बताया। कोर्ट ने राज्य सरकार को 6 सप्ताह के भीतर इस मामले में फैसला करने का निर्देश दिया है।

रायपुर, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने नक्सली हमले में शहीद हुए एक पुलिस कांस्टेबल की 68 साल की मां को पारिवारिक पेंशन नहीं देने को अन्यायपूर्ण बताया। कोर्ट ने राज्य सरकार को 6 सप्ताह के भीतर इस मामले में फैसला करने का निर्देश दिया है।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने 11 फरवरी को शहीद की मां फिलिसिता लकरा द्वारा दायर याचिका पर यह आदेश पारित किया। उनका 21 साल का बेटा इग्नेशियस लकरा सूरजपुर जिले में छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल (सीएएफ) की 10वीं बटालियन में कांस्टेबल थे। 2002 में माओवादियों के साथ मुठभेड़ में वह शहीद हो गए थे।

पिता की मौत के बाद बंद कर दी पेंशन

इग्नेशियस की मौत के बाद उनके पिता और फिलिसिता के पति लोबिन को पारिवारिक पेंशन मिल रही थी। अगस्त 2020 में लोबिन के निधन के बाद जशपुर जिले के कोषागार कार्यालय ने पेंशन बंद कर दी। सीएएफ की 10वीं बटालियन के कमांडेंट और जशपुर और अंबिकापुर (सुरगुजा) के कोषागार अधिकारी से संपर्क करने के बावजूद महिला को कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने 2021 में हाई कोर्ट का रुख किया।

मां को अपात्र घोषित कर दिया

अक्टूबर 2021 में हाई कोर्ट ने अधिकारियों को इस मामले की गहन जांच करने और 60 दिनों के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया था। 10वीं बटालियन के कमांडेंट ने जवाब दिया कि छत्तीसगढ़ पुलिस कर्मचारी वर्ग असाधारण परिवार निर्वृत्ति पेंशन नियम (नियम) 1965 के तहत मूल पेंशनभोगी की मौत के बाद उत्तराधिकारी को पारिवारिक पेंशन देने का कोई प्रावधान नहीं है। वित्त विभाग के अंतर्गत कोषागार लेखा एवं पेंशन निदेशालय ने बाद में फिलिसिता लकरा को पारिवारिक पेंशन के लिए अपात्र घोषित कर दिया।

महिला के वकील ने नियमों को मनमाना बताया

महिला के वकील आशीष बेक ने तर्क दिया कि 1965 के नियम भेदभावपूर्ण थे क्योंकि छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (असाधारण पेंशन) नियम, 1963 में यह प्रावधान है कि मृतक कर्मचारी के पिता को स्वीकृत पेंशन उनकी मृत्यु के बाद माता को देय होगी। उन्होंने कहा कि 1965 के नियम 1963 के पुराने नियमों का अनुसरण करने वाले हैं, लेकिन मृतक कर्मचारी की माता को (पिता की मृत्यु के बाद) मिलने वाली पारिवारिक पेंशन के संबंध में 1965 के नियम मनमाने और भेदभावपूर्ण हैं।

इस याचिका का विरोध करते हुए उप महाधिवक्ता प्रसून कुमार भादुरी ने तर्क दिया कि 1963 के नियम सामान्य प्रकृति के थे। जबकि 1965 के नियम पुलिस कर्मियों की एक विशिष्ट श्रेणी पर लागू होने वाले विशेष प्रावधान थे और विशेष नियम सामान्य नियमों पर अधिभावी होते हैं।

परिवार के अन्य सदस्य को देने का प्रावधान नहीं

भादुरी ने कहा कि पेंशन नियम 1965 एक विशेष वर्ग के लिए बनाया गया विशेष नियम है। पेंशन नियम 1965 के नियम 5(5)(iv) में यह प्रावधान है कि यदि मृतक कर्मचारी की कोई विधवा नहीं है तो पेंशन का वितरण परिवार के सदस्यों के बीच निर्धारित तरीके से किया जाएगा। यदि परिवार पेंशन के पहले प्राप्तकर्ता की मृत्यु हो जाती है तो परिवार के किसी अन्य सदस्य को परिवार पेंशन का लाभ देने का कोई प्रावधान नहीं है।

याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया

दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद पीठ ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया। हाई कोर्ट ने कहा कि हमें यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि 1965 के अधिनियम में भी 1963 के नियमों के समान प्रावधान होना चाहिए। इसे 1970 में संशोधन द्वारा लागू किया गया था ताकि पेंशन स्वीकृत पिता की मृत्यु के बाद मृतक कर्मचारी की माता को पेंशन का लाभ मिल सके।

पिता को स्वीकृत पेंशन उनकी मौत के बाद माता को देय होगी

अदालत ने कहा कि मृतक कर्मचारी की माता को पेंशन से वंचित करना घोर अन्याय है, विशेषकर तब जब याचिकाकर्ता के पुत्र ने नक्सली हमले में अपनी जान गंवाई। हाई कोर्ट ने कहा कि हम इस याचिका का निपटारा इस टिप्पणी के साथ करते हैं कि 30 नवंबर 1970 की अधिसूचना द्वारा 1963 के नियमों में संशोधन के रूप में जोड़े गए ‘नोट 6’ को 1965 के नियमों का भी हिस्सा माना जाए और 1965 के नियमों के तहत पिता को स्वीकृत पेंशन उनकी मृत्यु के बाद माता को देय होगी।

हाई कोर्ट के आदेश में कहा गया कि प्रतिवादी अधिकारियों को निर्देश दिया जाता है कि वे इस याचिका में की गई टिप्पणियों के आलोक में याचिकाकर्ता के मामले पर छह सप्ताह के भीतर विचार करें और निर्णय लें।