April 20, 2026

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इंग्लैंड की पटौदी ट्रॉफी का नाम बदला, पूर्व कप्तान ने की आलोचना, ECB पर साधा निशाना

फारुख इंजीनियर ने कहा कि इंग्लैंड एवं वेल्स क्रिकेट बोर्ड ने भारत और इंग्लैंड के बीच टेस्ट सीरीज की ट्रॉफी का नाम बदलकर गलत किया और दिवंगत मंसूर अली पटौदी के नाम पर मेडल देने का फैसला उनके जैसे फैंस को खुश करने के लिए किया गया। ईसीबी ने 2007 में भारत और इंग्लैंड टेस्ट सीरीज के लिए पटौदी ट्रॉफी की शुरुआत की थी, लेकिन पांच मैचों की मौजूदा सीरीज शुरू होने से पहले इसका नाम बदलकर एंडरसन-तेंदुलकर ट्रॉफी कर दिया गया।

पूर्व भारतीय दिग्गज फारुख इंजीनियर ने कहा कि इंग्लैंड एवं वेल्स क्रिकेट बोर्ड ने भारत और इंग्लैंड के बीच टेस्ट सीरीज की ट्रॉफी का नाम बदलकर गलत किया और दिवंगत मंसूर अली पटौदी के नाम पर मेडल देने का फैसला उनके जैसे फैंस को खुश करने के लिए किया गया। ईसीबी ने 2007 में भारत और इंग्लैंड टेस्ट सीरीज के लिए पटौदी ट्रॉफी की शुरुआत की थी, लेकिन पांच मैचों की मौजूदा सीरीज शुरू होने से पहले इसका नाम बदलकर एंडरसन-तेंदुलकर ट्रॉफी कर दिया गया। इस फैसले की सुनील गावस्कर जैसे क्रिकेटरों ने आलोचना की थी।

इंजीनियर भी इस फैसले से निराश हैं लेकिन इसके साथ उन्हें ये भी लगता है कि सचिन तेंदुलकर और जेम्स एंडरसन की उपलब्धियां निर्विवाद हैं। तेंदुलकर ने ईसीबी से संपर्क किया, जिसके बाद घरेलू बोर्ड ने सीरीज जीतने वाली टीम के कप्तान को पटौदी पदक देने का फैसला किया।

मैनचेस्टर में रहने वाले इंजीनियर ने पीटीआई से कहा कि, टाइगर पटौदी मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे। मेरे बहुत अच्छे सहयोगी थी। हमने काफी टेस्ट मैच साथ में खेले। मुझे सबसे ज्यादा खुशी तब हुई जब 2007 में ट्रॉफी का नाम उनके नाम पर रखा गया।

उन्होंने कहा कि, एक ओर जहां मैं इस बात से बहुत निराश हूं कि पटौदी का नाम हटा दिया गया। मैं चाहता हूं कि टाइगर का नाम इस ट्रॉफी से जुड़ा रहता लेकिन इसके बजाय सचिन और एंडरसन के नाम पर इस ट्रॉफी का नाम रखने का फैसला किया गया जो खेल के दिग्गज हैं।

इंजीनियर ने आगे कहा कि, इसके बारे में बाद में सोचा गया। उन्हें इसकी घोषणा शुरू में ही कर देनी चाहिए थी, इसके ज्यादा विश्वसनीयता होती लेकिन कम से कम उन्होंने कम से कम उन्होंने कुछ तो किया। उम्मीद है कि पटौदी नाम इसे हमेशा जुड़ा रहेगा।

उन्होंने कहा कि, तेंदुलकर और एंडरसन की उपलब्धियों पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। इस कहानी के दो पहलू हैं। उन्होंने पदक का नाम पटौदी के नाम पर रखा है जो बहुत सोच-समझकर किया गया फैसला है।