राजकोट. गुजरात में दो चरणों में विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे। जैसे-जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आ रही है, सियासी सरगर्मी भी काफी बढ़ गई है। सौराष्ट्र की लड़ाई में राजकोट शहर की सीट केंद्र है। इस सीट को सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का गढ़ माना जाता है। सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही भाजपा ने इस चुनाव में राजकोट शहर से सभी चार मौजूदा उम्मीदवारों को बदल दिया है।
पूर्व मुख्यमंत्री और राजकोट (पश्चिम) के मौजूदा विधायक विजय रूपाणी चुनाव से बाहर हो गए थे। भाजपा ने राजकोट (पूर्व) के विधायक और परिवहन राज्य मंत्री अरविंद रैयानी, राजकोट (दक्षिण) के विधायक गोविंद पटेल और राजकोट (ग्रामीण) विधायक लाखाभाई सगठिया को टिकट देने से इनकार कर दिया है। संगठन से जड़े हुए नेताओं की जगह नए चेहरों ने ले ली है। बीजेपी ने राजकोट की डिप्टी मेयर दर्शिता शाह को प्रतिष्ठित राजकोट (पश्चिम) सीट से उम्मीदवार बनाया है। राजकोट (पूर्व) से पूर्व मेयर उदय कांगड़, राजकोट (दक्षिण) से उद्योगपति रमेश तिलारा और राजकोट (ग्रामीण) से पूर्व विधायक भानु बबरिया को चुनाव लड़ने के लिए चुना है।
मोदी के लिए खाली हुई थी राजकोट की सीट
2001 में राजकोट (पश्चिम) के विधायक वजुभाई वाला ने नरेंद्र मोदी के लिए सीट खाली कर दी थी। मोदी ने यहां से विधानसभा की शुरुआत की थी। बीजेपी को अपने गढ़ में भी इस साल एंटी इनकंबेंसी का सामना करना पड़ रहा है। महंगाई, माल और सेवा कर (जीएसटी) के कई रूप, कई पेपर लीक और खराब सड़कों को लेकर लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। इकोनॉमिक्स टाइम्स के साथ बातचीत में धर्मेंद्र बाजार के एक दुकानदार पिनाकिनभाई कहते हैं, “मैं भाजपा का कट्टर मतदाता रहा हूं। लेकिन अब हम सभी बदलाव चाहते हैं। महंगाई हमें चुभ रही है। कोविड -19 के बाद बाजार का हाल भी खराब है।” धर्मेंद्र बाजार के दुकानदारों का रूपाणी से भावनात्मक जुड़ाव है, जिनके भाइयों की आज भी मुख्य बाजार क्षेत्र में दुकानें हैं। रूपाणी को टिकट न देने से क्षेत्रवासियों को अच्छा नहीं लगा।
सुनारों के परिवार से ताल्लुक रखने वाले प्रतापभाई अपने व्यापार पर जीएसटी को एक प्रमुख दर्द बताते हैं। प्रतापभाई कहते हैं, “कोविड -19 के बाद बाजार नीचे है। उसके ऊपर जीएसटी लगाया गया है। हम सभी को कई फॉर्म भरने के लिए 5,000 रुपये प्रति माह पर चार्टर्ड एकाउंटेंट रखना पड़ता है। अब भाजपा को वोट नहीं दे सकते हैं।”
नोटा से बढ़ सकता है टेंशन
भाजपा के पारंपरिक मतदाताओं का कहना है कि वह किसी अन्य पार्टी को वोट नहीं दे सकते हैं। पिनाकिनभाई कहते हैं, “इस बार मेरी योजना उपरोक्त में से कोई नहीं यानी नोटा बटन दबाने की है।” हैरानी की बात यह है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में नोटा को तीसरा सबसे ज्यादा वोट मिला था। यहां कांग्रेस को भरोसे की कमी का सामना करना पड़ रहा है। शादी के मंडप लगाने का काम करने वाले अब्दुलभाई कहते हैं, “2017 में लोगों ने कांग्रेस को वोट दिया लेकिन इतने विधायक पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए। इस बात का कोई भरोसा नहीं है कि अगर आप कांग्रेस को वोट देंगे तो आपका वोट बर्बाद नहीं होगा। मैंने यह तय नहीं किया है कि मैं किसे वोट दूंगा।”
आप फैक्टर से सतर्क
आम आदमी पार्टी की सीमित अपील है और यह निम्न सामाजिक-आर्थिक वर्गों तक ही सीमित है। ऑटोरिक्शा चालक खुलकर पार्टी का समर्थन करते हैं और कहते हैं कि दिल्ली में उनके काम से मासिक आय बढ़ाने में मदद मिली है। देवपाड़ा क्षेत्र में ऑटो एसोसिएशन पुराने ऑटो को फेज आउट किए जाने का विरोध कर रही है। एक ऑटो चालक सचिनभाई कहते हैं, “हम आप का समर्थन कर रहे हैं। एसोसिएशन ने खुले तौर पर कहा है कि भाजपा हमारे हितों के खिलाफ काम कर रही है। इसलिए हमें किसी अन्य पार्टी के उपयुक्त उम्मीदवार का समर्थन करना चाहिए। हमने देखा है कि कैसे दिल्ली में आप ने ऑटो चालकों का समर्थन किया है। समय-समय पर किराया वृद्धि में मदद की है। भाजपा ने हमारे पुराने ऑटो को नए के साथ बदलने का फैसला किया है।”

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