25 सितंबर की दोपहर का वक्त था। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जैसलमेर में तनोट माता मंदिर के दर्शन कर रहे थे। कई विधायक जयपुर पहुंचे चुके थे, तो कुछ पहुंचने वाले थे। बाहर से यही लग रहा था कि सब कुछ कांग्रेस हाईकमान की लिखी स्क्रिप्ट के मुताबिक हो रहा है, लेकिन राजनीति में जैसा दिखता है, वैसा होता नहीं है। दोपहर में अचानक वरिष्ठ मंत्री के फोन से कॉल जाता है और फिर लिखी जाती है बगावत की स्क्रीप्ट।
कैसे तीन सलाहकारों ने ही गहलोत का खेल बिगाड़ दिया? कैसे एक वरिष्ठ मंत्री के फोन से हुई कॉल ने विधायकों को बगावत की राह पर ला दिया? सोनिया गांधी जिन्हें अपनी कुर्सी सौंपना चाहती थीं, आखिर ऐसी नौबत क्यों आ गई कि उन गहलोत को माफीनामे तक जाना पड़ा? खबर में आगे आपको ऐसे ही सवालों के जवाब पढ़ने को मिलेंगे। पहले जानते हैं सारे घटनाक्रम का बैकग्राउंड।
दरअसल, पहले यह माना जा रहा था कि गांधी परिवार गहलोत को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर देखना चाहता है ताकि उनके अनुभव का पार्टी को फायदा मिले और कार्यकर्ताओं में अगले चुनाव से पहले नई जान फूंकी जा सके, लेकिन पिछले दिनों जयपुर में जो घटनाक्रम हुआ और एक के बाद एक जो बयान सामने आए, उससे यह लगने लगा कि उनके सलाहकारों ने सारा मामला उलटा-पुलटा कर दिया।
मंत्री का फोन, लेकिन बात किसी और ने की
दरअसल सीएम हाउस में विधायक दल की बैठक में क्या स्टैंड रखना है, माकन-खड़गे के सामने क्या बोलना है? इसकी तैयारी 25 सितंबर की सुबह से ही गहलोत खेमे के कुछ वरिष्ठ मंत्रियों में चल रही थी। सभी विधायकों को मुख्यमंत्री निवास पर शाम 7 बजे दोनों ऑब्जर्वर के साथ होने वाली विधायक दल की मीटिंग की पहले से सूचना दी जा चुकी थी।
इस बीच दोपहर में एक वरिष्ठ मंत्री के एक फोन कॉल ने पूरे घटनाक्रम को अचानक बदल दिया। हालांकि फोन मंत्री का था, लेकिन बात किसी और ने की। इसी के बाद तय हुआ कि धारीवाल के घर पहले गहलोत गुट के विधायकों की मीटिंग होगी।
सबसे पहले महेश जोशी और महेंद्र चौधरी धारीवाल के पास पहुंचे। इसके बाद ही सभी विधायकों को पांच बजे धारीवाल के बंगले पहुंचने के लिए बुलाने का सिलसिला शुरू हुआ। फिर यहां से सीपी जोशी के घर जाकर इस्तीफे सौंपने की रणनीति बनाई गई। यहीं तय हुआ कि किसी भी हालत में सचिन पायलट को सीएम नहीं बनने दिया जाएगा।इस घटनाक्रम का नतीजा यह हुआ कि गांधी परिवार के विश्वस्त माने जाने वाले गहलोत की राजनीतिक छवि को नुकसान हुआ और यह माना जाने लगा कि वे राजस्थान के CM की कुर्सी को छोड़ने के लिए कतई तैयार नहीं हैं। इस बीच पांच दिन तक खेमेबाजी में बंटी कांग्रेस के नेताओं की तरफ से लगातार बयानों की बौछारों के बीच गुरुवार को दिल्ली में सोनिया गांधी के साथ मुलाकात में गहलोत को राजस्थान में पार्टी की हुई किरकिरी से आहत होकर माफी मांगनी पड़ी।

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