इंदौर। मध्यप्रदेश की सियासत में अब Gen Z यानी नई युवा पीढ़ी को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच रणनीतिक मुकाबला तेज होता दिखाई दे रहा है। विधानसभा चुनाव 2028 में अभी समय है, लेकिन दोनों प्रमुख दलों ने युवाओं के बीच अपनी पहुंच मजबूत करने की कवायद शुरू कर दी है।
दिलचस्प बात यह है कि दोनों पार्टियों का लक्ष्य लगभग एक है, लेकिन रास्ते अलग-अलग हैं। बीजेपी डिजिटल प्लेटफॉर्म, Reels और शॉर्ट वीडियो के जरिए युवाओं तक पहुंचने की तैयारी में है, जबकि कांग्रेस छात्रों के बीच सीधे संवाद को अपना हथियार बनाने की कोशिश कर रही है।
बीजेपी का फोकस—मोबाइल स्क्रीन पर पहुंच
बीजेपी अब पारंपरिक राजनीतिक प्रचार के साथ डिजिटल माध्यमों को भी ज्यादा प्रभावी तरीके से इस्तेमाल करने की तैयारी में है। पार्टी का जोर उन प्लेटफॉर्म पर है, जहां युवा अपना काफी समय बिताते हैं।
Reels, शॉर्ट वीडियो और दूसरे डिजिटल कंटेंट के जरिए सरकार की योजनाओं, संगठन की गतिविधियों और राजनीतिक संदेशों को युवाओं तक पहुंचाने की रणनीति बनाई जा रही है।
पार्टी की ओर से नेताओं को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रियता बढ़ाने और सरकारी योजनाओं से जुड़ी जानकारी डिजिटल माध्यमों पर साझा करने के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है।
बीजेपी की रणनीति के प्रमुख बिंदु:
Reels और शॉर्ट वीडियो पर जोर
सरकारी योजनाओं की डिजिटल ब्रांडिंग
सोशल मीडिया पर नेताओं की सक्रियता बढ़ाना
युवाओं के बीच संगठन की पहुंच मजबूत करना
Gen Z के डिजिटल स्पेस में राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाना
यानी बीजेपी का फोकस साफ तौर पर उस युवा वर्ग तक पहुंच बनाने पर है, जो राजनीतिक जानकारी का बड़ा हिस्सा मोबाइल और सोशल मीडिया के जरिए हासिल करता है।
कांग्रेस का दांव—सीधे छात्रों के बीच संवाद
दूसरी ओर कांग्रेस ने युवाओं के साथ सीधे संवाद की रणनीति पर जोर दिया है। 12 सितंबर को राहुल गांधी के इंदौर दौरे के दौरान ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम प्रस्तावित है।
इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्रों के शामिल होने की उम्मीद जताई जा रही है। राहुल गांधी छात्रों से संवाद कर उनके मुद्दों और समस्याओं को सुनने का प्रयास करेंगे।
कांग्रेस की रणनीति में बेरोजगारी, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, भ्रष्टाचार और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दे प्रमुख हो सकते हैं।
पार्टी की कोशिश है कि छात्रों से बातचीत के जरिए उनके सवालों को राजनीतिक मुद्दों में बदला जाए और युवाओं को सीधे राजनीतिक विमर्श से जोड़ा जाए।
रोजगार और शिक्षा बन सकते हैं कांग्रेस के बड़े मुद्दे
कांग्रेस युवाओं के बीच रोजगार और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की तैयारी में दिखाई दे रही है। प्रतियोगी परीक्षाओं में अवसर, रोजगार की उपलब्धता, शिक्षा व्यवस्था और भ्रष्टाचार जैसे विषयों पर छात्रों के साथ संवाद को राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनाया जा सकता है।
राहुल गांधी का प्रस्तावित इंदौर संवाद इसी व्यापक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
हालांकि कार्यक्रम और उसके एजेंडे से जुड़े अंतिम विवरण सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कांग्रेस इसे किस तरह आगे बढ़ाती है।
आखिर Gen Z पर इतना फोकस क्यों?
राजनीतिक दलों का Gen Z पर बढ़ता ध्यान केवल चुनावी गणित नहीं है। नई पीढ़ी की राजनीतिक सक्रियता और डिजिटल मौजूदगी ने पार्टियों की रणनीति को बदलने पर मजबूर किया है।
आज का युवा केवल राजनीतिक भाषण सुनने तक सीमित नहीं है। वह सोशल मीडिया पर अलग-अलग दावों को देखता है, प्रतिक्रिया देता है, सवाल पूछता है और अपने नेटवर्क में राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा करता है।
यही वजह है कि राजनीतिक दल अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि युवा क्या देख रहा है, क्या सोच रहा है और किन मुद्दों को महत्व दे रहा है।
Reels बनाम Direct Dialogue
मध्यप्रदेश की राजनीति में युवाओं को साधने की इस कोशिश को अगर एक लाइन में समझें तो मुकाबला कुछ ऐसा नजर आता है—
बीजेपी का फोकस: “जहां युवा है, वहीं पहुंचो।”
कांग्रेस का फोकस: “युवा क्या सोच रहा है, उसके बीच जाकर सुनो।”
एक तरफ सोशल मीडिया और डिजिटल कंटेंट है, तो दूसरी तरफ छात्रों के बीच सीधा संवाद।
यह रणनीतिक अंतर आने वाले महीनों में और स्पष्ट हो सकता है।
2028 से पहले ही शुरू हुई तैयारी?
विधानसभा चुनाव 2028 में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों की गतिविधियां बताती हैं कि युवा वोटर को लेकर रणनीति अभी से तैयार की जा रही है।
बीजेपी संगठनात्मक स्तर पर डिजिटल पहुंच बढ़ाने पर जोर दे रही है। वहीं कांग्रेस युवाओं और छात्रों से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक एजेंडे में प्रमुखता देने की कोशिश कर रही है।
इसका मतलब यह भी है कि आने वाले समय में चुनावी प्रचार सिर्फ मैदान में होने वाली बड़ी रैलियों तक सीमित नहीं रहेगा। मोबाइल स्क्रीन, सोशल मीडिया और कॉलेज कैंपस भी राजनीतिक मुकाबले के महत्वपूर्ण मैदान बन सकते हैं।
Gen Z के सामने असली सवाल क्या हैं?
युवाओं को आकर्षित करने के लिए केवल डिजिटल कंटेंट या बड़े संवाद कार्यक्रम पर्याप्त नहीं होंगे। रोजगार, शिक्षा, कौशल विकास, प्रतियोगी परीक्षाओं, स्टार्टअप, डिजिटल अवसर और भविष्य की सुरक्षा जैसे मुद्दे युवा मतदाताओं के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
इसलिए दोनों पार्टियों के सामने चुनौती सिर्फ युवाओं तक पहुंचने की नहीं, बल्कि उनके वास्तविक सवालों का भरोसेमंद जवाब देने की भी होगी।
कौन मारेगा बाजी?
मध्यप्रदेश की सियासत में अब दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल सकता है। एक तरफ बीजेपी Reels, शॉर्ट वीडियो और डिजिटल कैंपेन के जरिए Gen Z तक पहुंच बनाने की कोशिश करेगी, तो दूसरी ओर कांग्रेस छात्र संवाद और युवा मुद्दों के जरिए अपनी जमीन मजबूत करने का प्रयास कर रही है।
आखिरकार सवाल यही है कि क्या Gen Z बीजेपी की डिजिटल पॉलिटिक्स से प्रभावित होगी या कांग्रेस के डायरेक्ट डायलॉग को ज्यादा तवज्जो देगी?
2028 के विधानसभा चुनाव में इसका जवाब तो मिलेगा ही, लेकिन उससे पहले आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि मध्यप्रदेश की युवा राजनीति का नैरेटिव कौन तय करता है—मोबाइल स्क्रीन पर चलने वाली Reels या छात्रों के बीच होने वाला सीधा संवाद।

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