Goncha Festival Bastar
छत्तीसगढ़ के बस्तर की सांस्कृतिक पहचान माने जाने वाले गोंचा पर्व का समापन इस वर्ष भी श्रद्धा, उत्साह और पारंपरिक उल्लास के साथ हुआ। भगवान जगन्नाथ, माता सुभद्रा और भगवान बलभद्र की बाहुड़ा रथयात्रा के साथ देव विग्रहों की जनकपुरी (गुंडिचा मंदिर) से मुख्य मंदिर में वापसी हुई। इस दौरान हजारों श्रद्धालुओं ने रथयात्रा में भाग लेकर भगवान के दर्शन किए और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की।
बस्तर का यह लगभग 600 वर्ष पुराना लोकपर्व अपनी अनूठी परंपराओं, विशेषकर ‘तुपकी’ की सलामी और गोंचा फल के कारण देशभर में अलग पहचान रखता है। धार्मिक आस्था और लोक संस्कृति का यह अनोखा संगम हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है।
बाहुड़ा रथयात्रा के साथ हुआ पर्व का समापन
गोंचा पर्व का समापन भगवान जगन्नाथ, माता सुभद्रा और भगवान बलभद्र की बाहुड़ा रथयात्रा के साथ हुआ। रथ पर विराजमान देव विग्रहों का श्रद्धालुओं ने पूरे भक्तिभाव से स्वागत किया।
रथयात्रा के दौरान पूरे जगदलपुर में भक्ति और उत्सव का माहौल देखने को मिला। श्रद्धालु पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए और भगवान के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।
‘तुपकी’ की सलामी बनी सबसे बड़ा आकर्षण
गोंचा पर्व की सबसे अनोखी पहचान ‘तुपकी’ है, जो बस्तर की सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है।
तुपकी एक विशेष प्रकार की बांस से बनी नली होती है, जिसमें पेंग (मलकांगनी) के बीज भरकर भगवान जगन्नाथ को पारंपरिक सलामी दी जाती है।
इस परंपरा की खास बातें—
बांस से तैयार की जाती है तुपकी।
इसमें पेंग (मलकांगनी) के बीज डाले जाते हैं।
बीज छोड़ने पर मधुर ध्वनि उत्पन्न होती है।
इसे भगवान जगन्नाथ के प्रति सम्मान और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है।
रथयात्रा के दौरान हजारों श्रद्धालुओं ने तुपकी की सलामी देकर इस ऐतिहासिक परंपरा को जीवंत बनाए रखा।
जनप्रतिनिधियों ने की पूजा-अर्चना
बाहुड़ा गोंचा के अवसर पर कई जनप्रतिनिधि भी रथयात्रा में शामिल हुए।
इस दौरान प्रमुख रूप से उपस्थित रहे—
वन मंत्री केदार कश्यप
बस्तर सांसद महेश कश्यप
जगदलपुर विधायक किरण सिंह देव
चित्रकोट विधायक विनायक गोयल
सभी जनप्रतिनिधियों ने भगवान जगन्नाथ की पूजा-अर्चना कर प्रदेश और बस्तर क्षेत्र की सुख-शांति, समृद्धि और खुशहाली की कामना की।
बस्तर की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक
गोंचा पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और लोक परंपराओं का जीवंत प्रतीक भी है।
इस पर्व की विशेषताएं—
लगभग 600 वर्षों से चली आ रही परंपरा।
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा से जुड़ा विशेष उत्सव।
तुपकी की अनूठी परंपरा।
गोंचा फल का सांस्कृतिक महत्व।
आदिवासी और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम।
इसी कारण यह पर्व बस्तर की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
संस्कृति संरक्षण पर सरकार का जोर
राज्य सरकार का कहना है कि छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं, धार्मिक आयोजनों और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में पारंपरिक लोक उत्सवों को बढ़ावा देने और नई पीढ़ी तक उनकी विरासत पहुंचाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। वहीं, वन मंत्री केदार कश्यप भी बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के प्रयासों से जुड़े रहे हैं।
क्यों खास है गोंचा पर्व?
गोंचा पर्व को अन्य रथयात्राओं से अलग बनाने वाली कई विशेषताएं हैं—
भगवान जगन्नाथ की बाहुड़ा रथयात्रा।
600 साल पुरानी ऐतिहासिक परंपरा।
तुपकी से दी जाने वाली अनोखी सलामी।
बस्तर की लोक संस्कृति और धार्मिक आस्था का संगम।
हजारों श्रद्धालुओं की भागीदारी।

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