July 29, 2026

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PM मोदी की कूटनीतिक सौगात में बस्तर की कला का जलवा! न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री को भेंट की गई ‘ढोकरा ट्री ऑफ लाइफ’ ने बढ़ाया छत्तीसगढ़ का गौरव

छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत ने एक बार फिर विश्व मंच पर अपनी खास पहचान बनाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन को छत्तीसगढ़ के बस्तर की प्रसिद्ध ढोकरा ट्री ऑफ लाइफ (जीवन वृक्ष) धातु शिल्पकृति भेंट की। यह उपहार केवल एक कलाकृति नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन परंपरा, जनजातीय संस्कृति और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन दर्शन का प्रतीक बन गया है।

प्रधानमंत्री द्वारा अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक उपहार के रूप में बस्तर की इस अनूठी कला का चयन छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का क्षण है। इससे बस्तर की हजारों वर्ष पुरानी जनजातीय कला को वैश्विक पहचान मिली है और स्थानीय शिल्पकारों का सम्मान भी बढ़ा है।

विश्व मंच पर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान

बस्तर की ढोकरा कला लंबे समय से अपनी विशिष्ट शैली और अद्भुत शिल्प कौशल के लिए प्रसिद्ध रही है। अब जब यह कला विश्व नेताओं के बीच पहुंची है, तो छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है।

इस उपलब्धि का महत्व

  • बस्तर की जनजातीय कला को वैश्विक मंच मिला।
  • स्थानीय शिल्पकारों का उत्साह बढ़ेगा।
  • भारतीय संस्कृति और परंपराओं का अंतरराष्ट्रीय प्रचार होगा।
  • छत्तीसगढ़ की पहचान कला और संस्कृति के क्षेत्र में मजबूत होगी।

क्या है बस्तर की ढोकरा कला?

बस्तर की ढोकरा कला दुनिया की सबसे प्राचीन धातु शिल्प परंपराओं में शामिल मानी जाती है। इसे बनाने के लिए लॉस्ट वैक्स कास्टिंग (मोम सांचा ढलाई) तकनीक का उपयोग किया जाता है।

इस कला की खासियत यह है कि हर कलाकृति पूरी तरह हाथ से तैयार की जाती है। यही कारण है कि प्रत्येक ढोकरा शिल्प अपनी डिजाइन, बनावट और कलात्मक अभिव्यक्ति में अलग दिखाई देता है।

ढोकरा कला की विशेषताएं

  • हजारों वर्षों पुरानी परंपरा।
  • पूरी तरह हस्तनिर्मित प्रक्रिया।
  • प्राकृतिक और जनजातीय जीवन से प्रेरित डिजाइन।
  • कलाकारों की पीढ़ियों से चली आ रही विरासत।

‘ट्री ऑफ लाइफ’ शिल्पकृति का विशेष महत्व

प्रधानमंत्री द्वारा भेंट की गई ट्री ऑफ लाइफ (जीवन वृक्ष) शिल्पकृति का गहरा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व है।

यह शिल्पकृति प्रतीक है—

  • जीवन और प्रकृति के संबंध का।
  • समृद्धि और नवजीवन का।
  • मानव और पर्यावरण के बीच संतुलन का।
  • पीढ़ियों के जुड़ाव और सांस्कृतिक निरंतरता का।

भारतीय दर्शन में यह कल्पवृक्ष की अवधारणा से जुड़ी है। वहीं न्यूजीलैंड के माओरी समुदाय की व्हाकापापा अवधारणा से भी इसका संबंध देखा जाता है, जिसमें जीवन, प्रकृति और वंश परंपरा के आपसी रिश्ते को महत्व दिया जाता है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सरकार के प्रयास

छत्तीसगढ़ सरकार राज्य की जनजातीय संस्कृति और पारंपरिक कलाओं को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में लोककला, हस्तशिल्प और आदिवासी परंपराओं को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है।

सरकार की पहल से—

  • कलाकारों को प्रोत्साहन मिल रहा है।
  • पारंपरिक शिल्प को नए बाजार मिल रहे हैं।
  • युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ रही है।
  • स्थानीय कला को नई पहचान मिल रही है।

संस्कृति विभाग की महत्वपूर्ण भूमिका

छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग भी राज्य की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। लोककलाओं, जनजातीय परंपराओं और पारंपरिक शिल्पों को दस्तावेजीकृत करने के साथ उन्हें बड़े मंचों तक पहुंचाने का काम किया जा रहा है।

ढोकरा कला को मिला यह वैश्विक सम्मान इन प्रयासों की सफलता को दर्शाता है।

जनजातीय कलाकारों के लिए नई उम्मीद

बस्तर की ढोकरा कला केवल सजावटी वस्तु नहीं है, बल्कि यह यहां के जनजातीय समाज की जीवनशैली, आस्था और प्रकृति के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति है।

इस कला से जुड़े हजारों कलाकारों के लिए यह उपलब्धि नई संभावनाएं लेकर आई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने से उनके उत्पादों की मांग बढ़ सकती है और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है।