बिलासपुर। न्यायधानी बिलासपुर के बहुचर्चित फर्जी कार्डियोलॉजिस्ट मामले में पुलिस ने करीब 17 वर्ष पुराने घटनाक्रम की विस्तृत जांच पूरी कर ली है। पुलिस जांच में सामने आया कि आरोपी डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव उर्फ नरेन्द्र जॉन कैम ने कथित रूप से फर्जी पहचान और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर स्वयं को हृदय रोग विशेषज्ञ (कार्डियोलॉजिस्ट) बताकर एक निजी अस्पताल में सेवाएं दीं और कई मरीजों का इलाज किया।
पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह के निर्देशन में हुई जांच के बाद आरोपी के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य मिलने पर न्यायालय में चार्जशीट दाखिल कर दी गई है। वहीं, अस्पताल प्रबंधन और चयन समिति की भूमिका की अलग से जांच के बाद उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उनके संबंध में क्लोजर रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की गई है।
जांच में सामने आए फर्जी दस्तावेजों के आरोप
पुलिस के अनुसार, आरोपी ने स्वयं को एमबीबीएस, एमआरसीपी और इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी का विशेषज्ञ बताया था।
जांच के दौरान सामने आए प्रमुख बिंदु:
- मेडिकल काउंसिल से विशेषज्ञ पंजीकरण की पुष्टि नहीं हुई।
- उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज से संबंधित शैक्षणिक रिकॉर्ड की पुष्टि नहीं हो सकी।
- दमोह में दर्ज मामले की जांच में कथित रूप से “नरेन्द्र जॉन कैम” नाम से आधार कार्ड, पैन कार्ड और अन्य पहचान दस्तावेज तैयार कराने की बात सामने आई।
- आरोपी अपने दावों के अनुरूप विशेषज्ञता से जुड़े आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका।
पुलिस ने आरोपी को प्रोडक्शन वारंट पर दमोह से बिलासपुर लाकर पूछताछ की थी। पूछताछ में उसने स्वीकार किया कि वह संबंधित अस्पताल में कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत था और उसने कई एंजियोग्राफी तथा एंजियोप्लास्टी प्रक्रियाएं की थीं।
27 मरीजों की मौत की भी हुई जांच
जांच के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि आरोपी के कार्यकाल में उपचार प्राप्त करने वाले लगभग 27 मरीजों की मृत्यु हुई थी।
हालांकि, पुलिस ने स्पष्ट किया कि:
- इन सभी मामलों को आरोपी की कथित फर्जी विशेषज्ञता से कानूनी रूप से जोड़ने के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं मिले।
- केवल दो शिकायतकर्ताओं ने औपचारिक शिकायत दर्ज कराई।
- अन्य मामलों में प्रमाणित दस्तावेज या पर्याप्त साक्ष्य सामने नहीं आए।
इसी कारण पुलिस ने इन मौतों को आरोपी के खिलाफ आपराधिक आरोपों से सीधे तौर पर जोड़ने का दावा नहीं किया है।
आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल
पुलिस जांच में आरोपी के खिलाफ कथित रूप से:
- फर्जी दस्तावेज तैयार करने,
- कूटरचना,
- धोखाधड़ी,
- और बिना वैध विशेषज्ञता के विशेषज्ञ चिकित्सक बनकर चिकित्सा सेवाएं देने
से जुड़े पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद 27 जून 2025 को न्यायालय में चार्जशीट पेश की गई।
अस्पताल प्रबंधन की भूमिका पर क्या मिला?
आरोपी के खिलाफ चालान पेश होने के बाद पुलिस ने अस्पताल प्रबंधन और चयन समिति की भूमिका की भी अलग से जांच की।
जांच के दौरान:
- नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों का परीक्षण किया गया।
- संबंधित अधिकारियों से पूछताछ की गई।
- पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया।
अस्पताल प्रबंधन ने बताया कि नियुक्ति लगभग 17–18 वर्ष पहले हुई थी और उस समय रिकॉर्ड हार्ड कॉपी में रखे जाते थे। रिकॉर्ड संरक्षण अवधि समाप्त होने के कारण कई पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हो सके।
पुलिस ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों और विधिक राय के आधार पर ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि अस्पताल प्रबंधन या चयन समिति ने जानबूझकर किसी आपराधिक षड्यंत्र के तहत आरोपी की नियुक्ति की थी। इसी आधार पर संबंधित पक्षों के संबंध में क्लोजर रिपोर्ट न्यायालय में पेश की गई।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
यह मामला केवल एक व्यक्ति की कथित फर्जी पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि निजी अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति, दस्तावेजों के सत्यापन और निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
यदि जांच में लगाए गए आरोप न्यायिक प्रक्रिया में सिद्ध होते हैं, तो यह मामला स्वास्थ्य क्षेत्र में सत्यापन व्यवस्था को और मजबूत बनाने की आवश्यकता की ओर संकेत करता है। फिलहाल आरोपी के खिलाफ मामला न्यायालय में विचाराधीन है और अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।

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