छत्तीसगढ़ के कबीरधाम (कवर्धा) जिले से इतिहास और संस्कृति प्रेमियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा संचालित ‘ज्ञान भारतम् राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान’ के तहत जिले में 38 दुर्लभ और ऐतिहासिक दस्तावेजों की पहचान की गई है। इनमें सबसे खास 375 वर्ष पुरानी तालपत्र (पाम लीफ) पांडुलिपि है, जो बंगाली भाषा में लिखी गई है और प्राचीन पाक-कला से जुड़ी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे मध्य भारत के इतिहास, संस्कृति और ज्ञान परंपरा को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
375 साल पुरानी तालपत्र पांडुलिपि बनी आकर्षण का केंद्र
सर्वेक्षण के दौरान मिली सबसे दुर्लभ धरोहर एक प्राचीन तालपत्र पांडुलिपि है। यह लगभग 375 वर्ष पुरानी बताई जा रही है और बंगाली भाषा में लिखी गई है।
इस पांडुलिपि की खास बातें:
- प्राचीन पाक-कला (कुकिंग आर्ट) से संबंधित जानकारी।
- तत्कालीन खानपान संस्कृति की झलक।
- उस समय की जीवनशैली और सामाजिक परंपराओं का वर्णन।
- भारतीय पारंपरिक ज्ञान प्रणाली का महत्वपूर्ण दस्तावेज।
इतिहासकारों के अनुसार ऐसी पांडुलिपियां बेहद दुर्लभ होती हैं और इनके अध्ययन से कई नई जानकारियां सामने आ सकती हैं।
मिलीं धार्मिक और साहित्यिक धरोहरें
ज्ञान भारतम् अभियान के दौरान कई महत्वपूर्ण धार्मिक और साहित्यिक पांडुलिपियां भी सामने आई हैं।
प्रमुख दस्तावेज:
- वर्ष 1839 की संस्कृत में लिखित गीत गोविंद की दुर्लभ प्रति।
- वर्ष 1856 की हस्तलिखित श्रीमद्भगवद्गीता।
- गजेंद्र मोक्ष से संबंधित प्राचीन प्रतियां।
- वैदिक और आध्यात्मिक साहित्य की कई दुर्लभ पोथियां।
ये दस्तावेज भारतीय भक्ति आंदोलन और सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
भोरमदेव और मड़वा महल से जुड़े ऐतिहासिक अभिलेख
सर्वेक्षण में क्षेत्रीय इतिहास से जुड़े कई महत्वपूर्ण अभिलेख भी मिले हैं।
इनमें शामिल हैं:
- रामनगर (मंडला) शिलालेख का हिंदी अनुवाद।
- 1867 में किया गया भोरमदेव शिलालेख का अनुवाद।
- 1898 का मड़वा महल शिलालेख का पद्यात्मक अनुवाद।
ये अभिलेख मध्य भारत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक इतिहास को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
ब्रह्मांड विज्ञान और वैदिक ज्ञान की झलक
अभियान के दौरान ऐसी कई पोथियां भी मिली हैं जो प्राचीन भारतीय विज्ञान और दर्शन की जानकारी देती हैं।
इनमें शामिल हैं:
- ब्रह्मांड के चित्रांकन से जुड़े संस्कृत दस्तावेज।
- जैमिनी परंपरा की पोथियां।
- ज्योतिष और खगोल विज्ञान संबंधी ग्रंथ।
- वैदिक अनुष्ठानों से जुड़ी पांडुलिपियां।
इन दस्तावेजों का अध्ययन भारतीय ज्ञान-विज्ञान की प्राचीन परंपरा को बेहतर तरीके से समझने में मदद करेगा।
निजी संग्रहों से सामने आईं अमूल्य धरोहरें
अधिकांश दस्तावेज कवर्धा के निजी संग्रहकर्ताओं द्वारा वर्षों से सुरक्षित रखे गए थे।
इनमें प्रमुख रूप से:
- आदित्य श्रीवास्तव का निजी संग्रह।
- अजय कुमार चंद्रवंशी का संग्रह।
- ग्राम बसनी निवासी सुभाष पाण्डेय का संग्रह।
इन संग्रहों से कई तांत्रिक, वैदिक और धार्मिक ग्रंथों की दुर्लभ प्रतियां प्राप्त हुई हैं।
अब होगा डिजिटलीकरण और वैज्ञानिक संरक्षण
ज्ञान भारतम् अभियान के तहत चिन्हित सभी 38 दस्तावेजों का:
- डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा।
- वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण किया जाएगा।
- भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जाएगा।
- शोध और अध्ययन के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन दस्तावेजों से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन ज्ञान परंपरा के कई अनछुए पहलुओं पर प्रकाश पड़ेगा।
कलेक्टर की नागरिकों से अपील
कलेक्टर गोपाल वर्मा ने जिले के लोगों से अपील की है कि यदि उनके पास कोई पुरानी पोथी, वंशावली, हस्तलिखित ग्रंथ या ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद हैं, तो उनकी जानकारी प्रशासन को दें।
नागरिक:
- ज्ञान भारतम् ऐप डाउनलोड कर सकते हैं।
- दस्तावेजों का ऑनलाइन पंजीकरण कर सकते हैं।
- राष्ट्रीय संरक्षण अभियान का हिस्सा बन सकते हैं।
मुख्य बातें
- कबीरधाम जिले में 38 दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेजों की पहचान।
- 375 वर्ष पुरानी तालपत्र पांडुलिपि बनी आकर्षण का केंद्र।
- गीत गोविंद, श्रीमद्भगवद्गीता और गजेंद्र मोक्ष की दुर्लभ प्रतियां मिलीं।
- भोरमदेव और मड़वा महल के ऐतिहासिक अभिलेख सामने आए।
- सभी दस्तावेजों का डिजिटलीकरण और वैज्ञानिक संरक्षण होगा।
- ज्ञान भारतम् अभियान को मिली बड़ी सफलता।

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