पीड़ित परिवार ने बुलडोजर प्रथा को तानाशाही बताया!
हाईकोर्ट इंदौर ( खण्डपीठ ) के जस्टिस अनिल वर्मा ने प्रथमदृष्टया उज्जैन के थूककाण्ड को बेबुनियाद बताया है !
इंदौर हाईकोर्ट ने तीनों नाबालिग आरोपियों को जमानत पर रिहा करने का आदेश पारित कर दिया है। उज्जैन की विचारण न्यायालय शीघ्र ही गुण – दोष के आधार पर फैसला सुना देगी।
इंदौर//फारुख मंसूरी :
प्रत्यक्षदर्शियों एवं चालान के अनुसार पूरा मामला कुछ इस प्रकार है – दिनांक 17 जुलाई 2023 को शोभायात्रा के दौरान तीन बच्चों ने कथित तौर पर अपने घर के छत से थूका, न्यूज 18 के पत्रकार अमन चोपड़ा अपने कैमरामैन के साथ पूरे समय शोभायात्रा को कव्हर कर रहे थे। शोभायात्रा में शामिल लोगों के पास स्मार्टफोन मौजूद था। हल्फिया तौर यह कहना अतिश्योक्ति नही होगा, कि महाकाल की नगरी उज्जैन की शोभायात्रा का अब तक सभी समुदाय के अनुयाई स्वागत अभिनन्दन करते रहे हैं। शोभायात्रा के लिए सभी के मन में प्रचुरमात्रा में सम्मान भाव मौजूद है। सरकार की नज़रों में अच्छा बनने की होड़ में कतिपय विध्न असंतोषियो ने गाल बजाया है। अतीत के खट्टे – मीठे अनुभव के बावजूद हमें देश की न्यायपालिका पर भरोसा है, जल्दी ही लेकिन जल्दबाजी में नहीं न्याय अवश्य करेगी।
आरोपियों पर भारतीय दण्ड संहिता निम्न धाराएं आरोपित है –
भारतीय दण्ड संहिता की धारा 153 ( A ) – धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास, भाषा आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना और सद्भाव के प्रतिकूल कार्य करना। ( इस अपराध के सिद्ध होने पर अधिकतम सजा 3 वर्ष )
भारतीय दण्ड संहिता की धारा 295 – जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्यों के लिए दंड का प्रावधान करती है। जिसका उद्देश्य किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके उसकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना है। ( इस अपराध के सिद्ध होने पर अधिकतम सजा 3 वर्ष )
भारतीय दण्ड संहिता की धारा 296 – के अनुसार कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से किसी भी तरह की सभा में बाधा उत्पन्न करता है। विधिपूर्वक धार्मिक पूजा या धार्मिक अनुष्ठान करने में लगे लोगों की कार्रवाई बाधा उत्पन्न करना। ( इस अपराध के सिद्ध होने पर 1वर्ष की सजा )
भारतीय दण्ड संहिता की धारा 505 – विभिन्न समुदायों के बीच शत्रुता, घॄणा या वैमनस्य की भावनाएं पैदा करने के आशय से असत्य कथन, जनश्रुति, आदि, परिचालित करना। सजा – तीन वर्ष कारावास, या आर्थिक दण्ड, या दोनों। यह अपराध गैर-जमानती, संज्ञेय है तथा किसी भी न्यायधीश द्वारा विचारणीय है। ( इस अपराध के सिद्ध होने पर अधिकतम सजा 3 वर्ष )
पहले पहल देखने से प्रतीत होता है, कि मामला झूठ के बुनियाद पर टिका आधारहीन है। हाईकोर्ट इंदौर के जस्टिस अनिल वर्मा की न्यायिक टिप्पणी से इतना तो पता चलता है, कि साक्ष्य के नाम पर शून्य है। शिकायतकर्ता और गवाह के बयानों ने अभियोजन की कलाई खोलकर रख दी है।
असरफ हुसैन का संयुक्त परिवार है, सभी भाई मिल – जुलकर साथ रहते हैं, मकान – दुकान पुश्तैनी है। जो कि बुलडोजर न्याय के चलते पूरा का पूरा परिवार साजो – समान के साथ पलक झपकते ही सड़क पर बिखर गया।
आरोपी बच्चे यदि दोषमुक्त होते हैं। जिसकी उम्मीद है, प्रकरण के दस्तावेज उम्मीद जगाते हैं। प्रकरण में दोषपूर्ण एफआईआर हैं, मुद्दई और गवाह का बयान पारदर्शी है, इस पार से उस पार सबकुछ दिखाई दे रहा है। ढहाएं गए पुश्तैनी मकान – दुकान का मुआवजा क्या सरकार देगी ? बिखर गए परिवार के सिसकियों – आहों का मुआवजा कौन देगा ? इस हादसे के सदमे से अविरल बहते आंसुओं का मुआवजा कौन देगा ? कौन देगा हिन्दू भाईयों के बीच बैरी बनाने का हिसाब ? कौन लौटायेगा भाईचारे रिश्ते को, कौन नही जानता पलों की गलतियां सदियां भुगतती है।
जज साहेब से इल्तिज़ा है, न्याय भरा फैसला लिखते समय यह जरूर लिखें, कि यह बुलडोजर हमारे मकान – दुकान, हमारी जिंदगी, हमारे उम्मीद को किस अधिनियम के अधीन रौंद डाला।

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